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Rigveda Mandal 7 / Sukta 12 / Mantra 3

104 Sukta
3 Mantra
7/12/3
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं वरु॑ण उ॒त मि॒त्रो अ॑ग्ने॒ त्वां व॑र्धन्ति म॒तिभि॒र्वसि॑ष्ठाः। त्वे वसु॑ सुषण॒नानि॑ सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥३॥

त्वम् । वरु॑णः । उ॒त । मि॒त्रः । अ॒ग्ने॒ । त्वाम् । व॒र्ध॒न्ति॒ । म॒तिऽभिः॑ । वसि॑ष्ठाः । त्वे इति॑ । वसु॑ । सु॒ऽस॒ण॒नानि॑ । स॒न्तु॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः। त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

त्वम्। वरुणः। उत। मित्रः। अग्ने। त्वाम्। वर्धन्ति। मतिऽभिः। वसिष्ठाः। त्वे इति। वसु। सुऽसणनानि। सन्तु। यूयम्। पात। स्वस्तिऽभिः। सदा। नः ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 3

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य स्वयं प्रकाशस्वरूप ईश्वर ! जो (वसिष्ठाः) सब विद्याओं में अतिशय कर निवास करनेवाले (मतिभिः) बुद्धियों से (त्वाम्) तुमको (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं उन (त्वे) आप में प्रीतिवालों के (वसु) द्रव्य (सुषणनानि) सुन्दर विभाग किये (सन्तु) हों जो (त्वम्) आप (वरुणः) श्रेष्ठ (उत) और (मित्रः) मित्र है सो आप हमारी (सदा) सदा रक्षा करो और हे विद्वानो ! (यूयम्) तुम लोग ईश्वर के तुल्य (नः) हमारी (स्वस्तिभिः) स्वस्थता सम्पादक क्रियाओं से (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे विद्वानों से सम्यक् बढ़ाया हुआ अग्नि दरिद्रता का विनाश करता है, वैसे ही उपासना किया परमेश्वर अज्ञान को निवृत्त करता है। जैसे आप्त लोग सब की सदा रक्षा करते हैं, वैसे परमात्मा सब संसार की रक्षा करता है ॥३॥ इस सूक्त में अग्नि, ईश्वर और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बारहवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वह उपासना किया ईश्वर क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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