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Rigveda Mandal 7 / Sukta 12 / Mantra 1

104 Sukta
3 Mantra
7/12/1
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग॑न्म म॒हा नम॑सा॒ यवि॑ष्ठं॒ यो दी॒दाय॒ समि॑द्धः॒ स्वे दु॑रो॒णे। चि॒त्रभा॑नुं॒ रोद॑सी अ॒न्तरु॒र्वी स्वा॑हुतं वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यञ्च॑म् ॥१॥

अग॑न्म । म॒हा । नम॑सा । यवि॑ष्ठम् । यः । दी॒दाय॑ । सम्ऽइ॑द्धः । स्वे । दु॒रो॒णे । चि॒त्रऽभा॑नुम् । रोद॑सी॒ इति॑ । अ॒न्तः । उ॒र्वी इति॑ । सुऽआ॑हुतम् । प्र॒त्यञ्च॑म् ॥

Mantra without Swara
अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे। चित्रभानुं रोदसी अन्तरुर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम् ॥

अगन्म। महा। नमसा। यविष्ठम्। यः। दीदाय। सम्ऽइद्धः। स्वे। दुरोणे। चित्रऽभानुम्। रोदसी इति। अन्तः। उर्वी इति। सुऽआहुतम्। विश्वतः। प्रत्यञ्चम् ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 15 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (स्वे) अपने (दुरोणे) घर में (समिद्धः) प्रकाशित है वह (दीदाय) सबको प्रकाशित करता है उसको (उर्वी) बड़ी (रोदसी) सूर्य-पृथिवी के (अन्तः) भीतर वर्त्तमान (चित्रभानुम्) अद्भुत किरणोंवाले (स्वाहुतम्) सुन्दर प्रकार ग्रहण किये (विश्वतः) सब ओर से (प्रत्यञ्चम्) पीछे चलने और (यविष्ठम्) अतिशय विभाग करनेवाले (महा) बड़े अग्नि को (नमसा) सत्कार वा अन्नादि से जैसे हम लोग (अगन्म) प्राप्त हों, वैसे इसको तुम लोग भी प्राप्त होओ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। विद्वानों को उचित है कि सब को ऐसा उपदेश करें कि जैसे हम लोग सब के अन्तःस्थित विद्युत् अग्नि को जानें, वैसे तुम लोग भी जानो ॥१॥
Subject
अब बारहवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में अग्नि कैसा है, इस विषय को कहते हैं ॥