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Rigveda Mandal 7 / Sukta 11 / Mantra 3

104 Sukta
5 Mantra
7/11/3
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रिश्चि॑द॒क्तोः प्र चि॑कितु॒र्वसू॑नि॒ त्वे अ॒न्तर्दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य। म॒नु॒ष्वद॑ग्न इ॒ह य॑क्षि दे॒वान्भवा॑ नो दू॒तो अ॑भिशस्ति॒पावा॑ ॥३॥

त्रिः । चि॒त् । अ॒क्तोः । प्र । चि॒कि॒तुः॒ । वसू॑नि । त्वे इति॑ । अ॒न्तः । दा॒शुषे॑ । मर्त्या॑य । म॒नु॒ष्वत् । अ॒ग्ने॒ । इ॒ह । य॒क्षि॒ । दे॒वान् । भव॑ । नः॒ । दू॒तः । अ॒भि॒श॒स्ति॒ऽपावा॑ ॥

Mantra without Swara
त्रिश्चिदक्तोः प्र चिकितुर्वसूनि त्वे अन्तर्दाशुषे मर्त्याय। मनुष्वदग्न इह यक्षि देवान्भवा नो दूतो अभिशस्तिपावा ॥

त्रिः। चित्। अक्तोः। प्र। चिकितुः। वसूनि। त्वे इति। अन्तः। दाशुषे। मर्त्याय। मनुष्वत्। अग्ने। इह। यक्षि। देवान्। भव। नः। दूतः। अभिशस्तिऽपावा ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (त्वे) आपके (अन्तः) बीच (दाशुषे) दानशील (मर्त्याय) मनुष्य के लिये (वसूनि) द्रव्यों को (अक्तोः) रात्रि के सम्बन्ध में (चित्) भी (त्रिः) तीन वार विद्वान् (प्र, चिकितुः) जानते हैं आप (इह) इस जगत् में (मनुष्वत्) मनुष्यों के तुल्य (देवान्) विद्वानों का (यक्षि) सत्कार कीजिये आप (नः) हमारे (दूतः) दूत के समान (अभिशस्तिपावा) प्रशंसितों के रक्षक पवित्रकारी (भव) हूजिये ॥३॥
Essence
जिसके सङ्ग से मनुष्यों को दिव्य गुण और पुष्कल धन प्राप्त होते हैं, इस जगत् में उसी की स्तुति कर, जो दूत के तुल्य परोपकारी होता है, वह सब को सत्य जताने को समर्थ होता है ॥३॥
Subject
किसके होने पर मनुष्य उत्तम गुण को प्राप्त होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥