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Rigveda Mandal 7 / Sukta 10 / Mantra 5

104 Sukta
5 Mantra
7/10/5
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒न्द्रं होता॑रमु॒शिजो॒ यवि॑ष्ठम॒ग्निं विश॑ ईळते अध्व॒रेषु॑। स हि क्षपा॑वाँ॒ अभ॑वद्रयी॒णामत॑न्द्रो दू॒तो य॒जथा॑य दे॒वान् ॥५॥

म॒न्द्रम् । होता॑रम् । उ॒शिजः॑ । यवि॑ष्ठम् । अ॒ग्निम् । विशः॑ । ई॒ळ॒ते॒ । अ॒ध्व॒रेषु॑ । सः । हि । क्षपा॑ऽवान् । अभ॑वत् । र॒यी॒णाम् । अत॑न्द्रः । दू॒तः । य॒जथा॑य । दे॒वान् ॥

Mantra without Swara
मन्द्रं होतारमुशिजो यविष्ठमग्निं विश ईळते अध्वरेषु। स हि क्षपावाँ अभवद्रयीणामतन्द्रो दूतो यजथाय देवान् ॥

मन्द्रम्। होतारम्। उशिजः। यविष्ठम्। अग्निम्। विशः। ईळते। अध्वरेषु। सः। हि। क्षपाऽवान्। अभवत्। रयीणाम्। अतन्द्रः। दूतः। यजथाय। देवान् ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो जिसको (अध्वरेषु) अग्निहोत्रादिक्रियारूप व्यवहारों में (मन्द्रम्) आनन्दकारी (होतारम्) दाता (यविष्ठम्) अतिजवान के तुल्य (अग्निम्) अग्नि की (उशिजः) कामना करते हुए (विशः) प्रजाजन (ईळते) स्तुति वा खोज करते हैं (सः, हि) वही (क्षपावान्) बहुत रात्रियोंवाला (अतन्द्रः) आलस्यरहित (दूतः) दूत के समान (रयीणाम्) द्रव्यों की (यजथाय) प्राप्ति के लिये (देवान्) दिव्यगुणों के प्राप्त करने को समर्थ (अभवत्) होता है ॥५॥
Essence
जो अग्नि, दूत के तुल्य सब विद्याओं का सङ्ग करनेवाला होता है, उसका सब मनुष्य खोज करें, जिससे सब गुणों की प्राप्ति हो ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और विदुषी के कर्त्तव्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह दशवाँ सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
मनुष्य प्रतिदिन किस का खोज करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥