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Rigveda Mandal 7 / Sukta 10 / Mantra 4

104 Sukta
5 Mantra
7/10/4
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रं॑ नो अग्ने॒ वसु॑भिः स॒जोषा॑ रु॒द्रं रु॒द्रेभि॒रा व॑हा बृ॒हन्त॑म्। आ॒दि॒त्येभि॒रदि॑तिं वि॒श्वज॑न्यां॒ बृह॒स्पति॒मृक्व॑भिर्वि॒श्ववा॑रम् ॥४॥

इन्द्र॑म् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । वसु॑ऽभिः । स॒ऽजोषाः॑ । रु॒द्रम् । रु॒द्रेभिः । आ । व॒ह॒ । बृ॒हन्त॑म् । आ॒दि॒त्येभिः॑ । अदि॑तिम् । वि॒श्वऽज॑न्याम् । बृह॒स्पति॑म् । ऋक्व॑ऽभिः । वि॒श्वऽवा॑रम् ॥

Mantra without Swara
इन्द्रं नो अग्ने वसुभिः सजोषा रुद्रं रुद्रेभिरा वहा बृहन्तम्। आदित्येभिरदितिं विश्वजन्यां बृहस्पतिमृक्वभिर्विश्ववारम् ॥

इन्द्रम्। नः। अग्ने। वसुऽभिः। सऽजोषाः। रुद्रम्। रुद्रेभिः। आ। वह। बृहन्तम्। आदित्येभिः। अदितिम्। विश्वऽजन्याम्। बृहस्पतिम्। ऋक्वऽभिः। विश्वऽवारम् ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् (सजोषाः) तुल्य सेवनकर्त्ता आप (नः) हमारे लिये (वसुभिः) पृथिव्यादि के साथ (इन्द्रम्) विद्युत् अग्नि को (रुद्रेभिः) प्राणों के साथ (बृहन्तम्) बड़े (रुद्रम्) जीवात्मा को (आदित्येभिः) बारह महीनों से (विश्वजन्याम्) संसारोत्पत्ति की हेतु (अदितिम्) अखण्डित कालविद्या को और (ऋक्वभिः) ऋग्वेदादि से (विश्ववारम्) सब के स्वीकार करने योग्य (बृहस्पतिम्) बड़ी ऋग्वेदादि वाणी के रक्षक परमात्मा को (आ, वहा) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये ॥४॥
Essence
जो ही पृथिव्यादि विद्या के साथ बिजुली की विद्या को, प्राणविद्या के साथ जीवविद्या को, कालविद्या के साथ प्रकृति के विज्ञान को और वेदविद्या से परमात्मा के विज्ञान कराने को समर्थ होता है, उसी का सब लोग विद्या प्राप्ति के लिये आश्रय करें ॥४॥
Subject
कौन विद्वान् निरन्तर सेवने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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