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Rigveda Mandal 7 / Sukta 10 / Mantra 1

104 Sukta
5 Mantra
7/10/1
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒षो न जा॒रः पृ॒थु पाजो॑ अश्रे॒द्दवि॑द्युत॒द्दीद्य॒च्छोशु॑चानः। वृषा॒ हरिः॒ शुचि॒रा भा॑ति भा॒सा धियो॑ हिन्वा॒न उ॑श॒तीर॑जीगः ॥१॥

उ॒षः । न । जा॒रः । पृ॒थु । पाजः॑ । अ॒श्रे॒त् । दवि॑द्युतत् । दीद्य॑त् । शोशु॑चानः । वृषा॑ । हरिः॑ । शुचिः॑ । आ । भा॒ति॒ । भा॒सा । धियः॑ । हि॒न्वा॒नः । उ॒श॒तीः । अ॒जी॒ग॒रिति॑ ॥

Mantra without Swara
उषो न जारः पृथु पाजो अश्रेद्दविद्युतद्दीद्यच्छोशुचानः। वृषा हरिः शुचिरा भाति भासा धियो हिन्वान उशतीरजीगः ॥

उषः। न। जारः। पृथु। पाजः। अश्रेत्। दविद्युतत्। दीद्यत्। शोशुचानः। वृषा। हरिः। शुचिः। आ। भाति। भासा। धियः। हिन्वानः। उशतीः। अजीगरिति ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 13 Mantra » 1

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Meaning
हे विद्वन् जैसे (जारः) जीर्ण करनेहारे के (न) तुल्य (शोशुचानः) शुद्ध संशोधक (वृषा) वृष्टिकर्त्ता (हरिः) हरणशील (उशतीः) कामना किये जाते (धियः) कर्मों वा बुद्धियों को (हिन्वानः) बढ़ाता हुआ अग्नि (अजीगः) जगाता है (भासा) दीप्ति से सब को (आ, भाति) प्रकाशित करता है (पृथु) विस्तृत (पाजः) अन्नादि का (अश्रेत्) आश्रय करता है, सब को (दविद्युतत्) प्रकट करता है (उषः) प्रभातवेला के तुल्य (शुचिः) पवित्र स्वयं (दीद्यत्) प्रकाशित होता है, वैसे आप कीजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जैसे उत्तम शिक्षा को प्राप्त विद्वान् यथावत् कार्य्यों को सिद्ध करते, वैसे ही विद्युत् आदि पदार्थ सम्प्रयोग में लाये हुए सब व्यवहारों को सिद्ध करते हैं ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले दशवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में अब विद्वान् किसके तुल्य क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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