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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 6

104 Sukta
25 Mantra
7/1/6
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उप॒ यमेति॑ युव॒तिः सु॒दक्षं॑ दो॒षा वस्तो॑र्ह॒विष्म॑ती घृ॒ताची॑। उप॒ स्वैन॑म॒रम॑तिर्वसू॒युः ॥६॥

उप॑ । यम् । एति॑ । यु॒व॒तिः । सु॒ऽदक्ष॑म् । दो॒षा । वस्तोः॑ । ह॒विष्म॑ती । घृ॒ताची॑ । उप॑ । स्वा । ए॒न॒म् । अ॒रम॑तिः । व॒सु॒ऽयुः ॥

Mantra without Swara
उप यमेति युवतिः सुदक्षं दोषा वस्तोर्हविष्मती घृताची। उप स्वैनमरमतिर्वसूयुः ॥

उप। यम्। एति। युवतिः। सुऽदक्षम्। दोषा। वस्तोः। हविष्मती। घृताची। उप। स्वा। एनम्। अरमतिः। वसुऽयुः ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जैसे (युवतिः) युवावस्था को प्राप्त कन्या (दोषा, वस्तोः) रात्रि दिन (सुदक्षम्) अच्छे बलयुक्त (यम्) जिस पति को (उप, एति) समीप से प्राप्त होती है जैसे (हविष्मती) ग्रहण करने योग्य बहुत वस्तुओंवाली (घृताची) रात्री चन्द्रमा को (उप) प्राप्त होती है तथा जैसे (अरमतिः) जिस के गृहस्थ के तुल्य रमण किया नहीं वह (वसूयुः) द्रव्यों की कामना करनेवाली (स्वा) अपनी स्त्री (एनम्) इस विवाहित प्रियपति को प्राप्त होके सुख पाती है, वैसे अग्निविद्या को प्राप्त होके तुम लोग निरन्तर आनन्दित होओ ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो दिन रात उद्यम और विद्या के द्वारा अग्निविद्या को प्रकट करते हैं, वे परस्पर प्रीति रखनेवाले की पुरुषों के तुल्य बड़े आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥६॥
Subject
फिर अग्नि-विद्या किसके तुल्य क्या उत्पन्न करती है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥