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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 5

104 Sukta
25 Mantra
7/1/5
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दा नो॑ अग्ने धि॒या र॒यिं सु॒वीरं॑ स्वप॒त्यं स॑हस्य प्रश॒स्तम्। न यं यावा॒ तर॑ति यातु॒मावा॑न् ॥५॥

दाः । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । धि॒या । र॒यिम् । सु॒ऽवीर॑म् । सु॒ऽअ॒प॒त्यम् । स॒ह॒स्य॒ । प्र॒ऽश॒स्तम् । न । यम् । यावा॑ । तर॑ति । या॒तु॒ऽमावा॑न् ॥

Mantra without Swara
दा नो अग्ने धिया रयिं सुवीरं स्वपत्यं सहस्य प्रशस्तम्। न यं यावा तरति यातुमावान् ॥

दाः। नः। अग्ने। धिया। रयिम्। सुऽवीरम्। सुऽअपत्यम्। सहस्य। प्रऽशस्तम्। न। यम्। यावा। तरति। यातुऽमावान् ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 23 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहस्य) बल में श्रेष्ठ (अग्नि) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् ! (धिया) बुद्धि वा कर्म से जैसे अग्नि क्रिया से (सुवीरम्) सुन्दर वीर जन (स्वपत्यम्) सुन्दर सन्तान जिससे हों उस (प्रशस्तम्) उत्तम (रयिम्) धन को (नः) हमारे लिये देता है (यम्) जिसकी (यातुमावान्) मेरे तुल्य चलता हुआ (यावा) गमनशील (न) नहीं (तरति) उल्लङ्घन करता, उस प्रकार की विद्या हमारे लिये बुद्धि से आप (दाः) दीजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जिसे अग्नि-विद्या से सुन्दर सन्तान, उत्तम शूरवीर जन श्रेष्ठ धन और यानों का बड़ा वेग उत्पन्न हो, उस विद्या को उत्तम विचार और अनेक प्रकार की क्रियाओं से प्रकट करो ॥५॥
Subject
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥