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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 4

104 Sukta
25 Mantra
7/1/4
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र ते अ॒ग्नयो॒ऽग्निभ्यो॒ वरं॒ निः सु॒वीरा॑सः शोशुचन्त द्यु॒मन्तः॑। यत्रा॒ नरः॑ स॒मास॑ते सुजा॒ताः ॥४॥

प्र । ते । अ॒ग्नयः॑ । अ॒ग्निऽभ्यः॑ । वर॑म् । निः । सु॒ऽवीरा॑सः । शो॒शु॒च॒न्त॒ । द्यु॒ऽमन्तः॑ । यत्र॑ । नरः॑ । स॒म्ऽआस॑ते । सु॒ऽजा॒ताः ॥

Mantra without Swara
प्र ते अग्नयोऽग्निभ्यो वरं निः सुवीरासः शोशुचन्त द्युमन्तः। यत्रा नरः समासते सुजाताः ॥

प्र। ते। अग्नयः। अग्निऽभ्यः। वरम्। निः। सुऽवीरासः। शोशुचन्त। द्युऽमन्तः। यत्र। नरः। सम्ऽआसते। सुऽजाताः ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 23 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सुवीरासः) सुन्दर वीर (नरः) पुरुषार्थ को प्राप्त करने हारे विद्वान् हैं (ते) वे (यत्र) जिस व्यवहार में (अग्निभ्यः) अग्नि के परमाणुओं से (सुजाताः) अच्छे प्रकार प्रकट हुए (द्युमन्तः) बहुत दीप्तिवाले (अग्नयः) विद्युत् आदि अग्नि उत्पन्न होते हैं उसमें (निः, शोशुचन्त) निरन्तर शुद्धि करते और उनसे (वरम्) उत्तम व्यवहार को (प्र, समासते) सम्यक् प्राप्त होते हैं, वैसे इसको प्रकट करके तुम लोग भी उत्तम सुख को प्राप्त होओ ॥४॥
Essence
जो मनुष्य अग्नि से अग्नि को उत्पन्न कर सिद्ध कामनावाले होके सर्वोत्तम सुख पाते हैं, वे जगत् में अच्छे प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥
Subject
फिर अग्नि किससे प्रकट करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥