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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 23

104 Sukta
25 Mantra
7/1/23
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स मर्तो॑ अग्ने स्वनीक रे॒वानम॑र्त्ये॒ य आ॑जु॒होति॑ ह॒व्यम्। स दे॒वता॑ वसु॒वनिं॑ दधाति॒ यं सू॒रिर॒र्थी पृ॒च्छमा॑न॒ एति॑ ॥२३॥

सः । मर्तः॑ । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽअ॒नी॒क॒ । रे॒वान् । अम॑र्त्ये । यः । आ॒ऽजु॒होति॑ । ह॒व्यम् । सः । दे॒वता॑ । व॒सु॒ऽवनि॑म् । द॒धा॒ति॒ । यम् । सू॒रिः । अ॒र्थी । पृ॒च्छमा॑नः । एति॑ ॥

Mantra without Swara
स मर्तो अग्ने स्वनीक रेवानमर्त्ये य आजुहोति हव्यम्। स देवता वसुवनिं दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति ॥

सः। मर्तः। अग्ने। सुऽअनीक। रेवान्। अमर्त्ये। यः। आऽजुहोति। हव्यम्। सः। देवता। वसुऽवनिम्। दधाति। यम्। सूरिः। अर्थी। पृच्छमानः। एति ॥२३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 27 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वनीक) सुन्दर सेनावाले (अग्ने) विद्या और विनयादि से प्रकाशमान जन ! (यः) जो (रेवान्) बहुत धनवाला होता हुआ (अमर्त्ये) मरणधर्मरहित अग्नि वा परमात्मा में (हव्यम्) देने योग्य घृतादि द्रव्य वा चित्त को (आजुहोति) अच्छे प्रकार छोड़ता वा स्थिर करता है (सः, देवता) दिव्यगुणयुक्त वह (वसुवनिम्) धनों के सेवन को (दधाति) धारण करता है (यम्) जिसको (अर्थी) प्रशस्त प्रयोजनवाला (पृच्छमानः) पूछता हुआ (सूरिः) विद्वान् (एति) प्राप्त होता है (सः) वह (मर्तः) मनुष्य सुखी करता है ॥२३॥
Essence
जो मनुष्य अग्निविद्या को जान के इस अग्नि में सुगन्ध्यादि का होम करते और इससे कार्यों को सिद्ध करते हैं और जो पूछ अच्छे प्रकार विचार और ध्यान कर के परमात्मा को जानते हैं, उनको अग्नि, धनाढ्य और परमात्मा विज्ञानवान् करता है ॥२३॥
Subject
फिर मनुष्यों को किसका सेवन करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥