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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 2

104 Sukta
25 Mantra
7/1/2
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तम॒ग्निमस्ते॒ वस॑वो॒ न्यृ॑ण्वन्त्सुप्रति॒चक्ष॒मव॑से॒ कुत॑श्चित्। द॒क्षाय्यो॒ यो दम॒ आस॒ नित्यः॑ ॥२॥

तम् । अ॒ग्निम् । अस्ते॑ । वस॑वः । नि । ऋ॒ण्व॒न् । सु॒ऽप्र॒ति॒चक्ष॑म् । अव॑से । कुतः॑ । चि॒त् । द॒क्षाय्यः॑ । यः । दमे॑ । आस॑ । नित्यः॑ ॥

Mantra without Swara
तमग्निमस्ते वसवो न्यृण्वन्त्सुप्रतिचक्षमवसे कुतश्चित्। दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः ॥

तम्। अग्निम्। अस्ते। वसवः। नि। ऋण्वन्। सुऽप्रतिचक्षम्। अवसे। कुतः। चित्। दक्षाय्यः। यः। दमे। आस। नित्यः ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 23 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (यः) जो (दक्षाय्यः) चतुर विद्वान् के तुल्य (दमे) घर वा इन्द्रियादि के दमन में (नित्यः) सनातन उपयोगी (आस) है जिस (सुप्रतिचक्षम्) मनुष्य जिसके द्वारा अनेक विद्याओं को अच्छे प्रकार देखता है (कुतश्चित्) किसी से (अवसे) रक्षा वा अधिक अन्न के लिये (वसवः) प्रथम कक्षा के विद्वान् (नि, ऋण्वन्) निरन्तर प्रसिद्ध करें (तम्) उस (अग्निम्) विद्युत् को (अस्ते) घर में वा फेंकने में आप लोग उत्पन्न करो ॥२॥
Essence
हे विद्वानो ! जो यह नित्यस्वरूप विद्युत् अग्नि स्थूल द्रव्यों को घर बना के नित्य स्वरूप से स्थित है, उस अग्नि को विद्या और क्रियाओं से प्रकट कर तथा कलायन्त्रों में संयुक्त कर के बहुत अन्न, धन और रक्षा को प्राप्त होओ ॥२॥
Subject
फिर उस बिजुली को कैसे प्रकट करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥