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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 18

104 Sukta
25 Mantra
7/1/18
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मो अ॑ग्ने वी॒तत॑मानि ह॒व्याज॑स्रो वक्षि दे॒वता॑ति॒मच्छ॑। प्रति॑ न ईं सुर॒भीणि॑ व्यन्तु ॥१८॥

इ॒मो इति॑ । अ॒ग्ने॒ । वी॒तऽत॑मानि । ह॒व्या । अज॑स्रः । व॒क्षि॒ । दे॒वऽता॑तिम् । इच्छ॑ । प्रति॑ । नः॒ । ई॒म् । सु॒र॒भीणि॑ । व्य॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
इमो अग्ने वीततमानि हव्याजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ। प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु ॥

इमो इति। अग्ने। वीतऽतमानि। हव्या। अजस्रः। वक्षि। देवऽतातिम्। इच्छ। प्रति। नः। ईम्। सुरभीणि। व्यन्तु ॥१८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) तेजस्विन् विद्वन् ! जिससे (अजस्रः) निरन्तर (देवतातिम्) उत्तम सुख देनेवाले यज्ञ को (अच्छ) अच्छे प्रकार (वक्षि) प्राप्त करते हैं इससे (इमो) इन (सुरभीणि) सुगन्धि आदि गुणों के सहित (वीततमानि) अतिशयकर व्याप्त होने को समर्थ (हव्या) देने योग्य वस्तुओं को (नः) हमारे (प्रति) प्रति (ईम्) सब ओर से (व्यन्तु) प्राप्त करें ॥१८॥
Essence
मनुष्य जैसे अग्नि में उत्तम हविष्यों का होम कर जल आदि को शुद्ध करके सब के उपकार को सिद्ध करते हैं, वैसे वर्त्ताव करना चाहिये ॥१८॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥