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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 17

104 Sukta
25 Mantra
7/1/17
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वे अ॑ग्न आ॒हव॑नानि॒ भूरी॑शा॒नास॒ आ जु॑हुयाम॒ नित्या॑। उ॒भा कृ॒ण्वन्तो॑ वह॒तू मि॒येधे॑ ॥१७॥

त्वे इति॑ । अ॒ग्ने॒ । आ॒ऽहव॑नानि । भूरि॑ । ई॒शा॒नासः॑ । आ । जु॒हु॒या॒म॒ । नित्या॑ । उ॒भा । कृ॒ण्वन्तः॑ । व॒ह॒तू इति॑ । मि॒येधे॑ ॥

Mantra without Swara
त्वे अग्न आहवनानि भूरीशानास आ जुहुयाम नित्या। उभा कृण्वन्तो वहतू मियेधे ॥

त्वे इति। अग्ने। आऽहवनानि। भूरि। ईशानासः। आ। जुहुयाम। नित्या। उभा। कृण्वन्तः। वहतू इति। मियेधे ॥१७॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) सत्यवादी आप्तविद्वान् ! जैसे (उभा) दोनों (वहतू) प्राप्ति करानेवाले यजमान और पुरोहित (मियेधे) परिमाण युक्त यज्ञ में (नित्या) नित्य (भूरि) बहुत (आहवनानि) अच्छे दानों को देते हैं, वैसे (ईशानासः) समर्थ हम लोग उन दोनों यजमान पुरोहितों को समर्थ (कृण्वन्तः) करते हुए (त्वे) अग्नि के तुल्य तेजस्वि आप स्वामी के होते हुए उन दोनों को (आ, जुहुयाम) अच्छे प्रकार देवें ॥१७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो यजमान और ऋत्विजों के तुल्य सब मनुष्यों का अच्छी शिक्षा से उपकार करते हैं, उनकी शिक्षा का सब लोग अनुष्ठान करें ॥१७॥
Subject
फिर मनुष्य लोग किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥