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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 16

104 Sukta
25 Mantra
7/1/16
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं सो अ॒ग्निराहु॑तः पुरु॒त्रा यमीशा॑नः॒ समिदि॒न्धे ह॒विष्मा॑न्। परि॒ यमेत्य॑ध्व॒रेषु॒ होता॑ ॥१६॥

अ॒यम् । सः । अ॒ग्निः । आऽहु॑तः । पु॒रु॒ऽत्रा । यम् । ईशा॑नः । सम् । इत् । इ॒न्धे । ह॒विष्मा॑न् । परि॑ । यम् । एति॑ । अ॒ध्व॒रेषु॑ । होता॑ ॥

Mantra without Swara
अयं सो अग्निराहुतः पुरुत्रा यमीशानः समिदिन्धे हविष्मान्। परि यमेत्यध्वरेषु होता ॥

अयम्। सः। अग्निः। आऽहुतः। पुरुऽत्रा। यम्। ईशानः। सम्। इत्। इन्धे। हविष्मान्। परि। यम्। एति। अध्वरेषु। होता ॥१६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यम्) जिसको (ईशान) जगदीश्वर (सम्, इन्धे) सम्यक् प्रकाशित करता है और (यम्) जिसको (हविष्मान्) देने योग्य बहुत वस्तुओं सहित (होता) होम करनेवाला (अध्वरेषु) हिंसारहित संग्रामादि व्यवहारों में (परि, एति) सब ओर से प्राप्त होता है (सः, अयम् इत्) सो वही (अग्निः) विद्युत् अग्नि (आहुतः) सम्यक् स्वीकार किया हुआ (पुरुत्रा) बहुत कार्य्यों को सिद्ध करता है ॥१६॥
Essence
हे विद्वानो ! ईश्वर ने जिसलिये बनाया है, जिसलिये ऋत्विज् और यजमान सेवन करते हैं, तदर्थ वह अग्नि तुम लोगों से बहुत व्यवहारों में प्रयुक्त किया हुआ अनेक कार्य्यों का सिद्ध करनेवाला होता है ॥१६॥
Subject
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥