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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 15

104 Sukta
25 Mantra
7/1/15
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सेद॒ग्निर्यो व॑नुष्य॒तो नि॒पाति॑ समे॒द्धार॒मंह॑स उरु॒ष्यात्। सु॒जा॒तासः॒ परि॑ चरन्ति वी॒राः ॥१५॥

सः । इत् । अ॒ग्निः । यः । व॒नु॒ष्य॒तः । नि॒ऽपाति॑ । स॒म्ऽए॒द्धार॑म् । अंह॑सः । उ॒रु॒ष्यात् । सु॒ऽजा॒तासः॑ । परि॑ । च॒र॒न्ति॒ । वी॒राः ॥

Mantra without Swara
सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात्। सुजातासः परि चरन्ति वीराः ॥

सः। इत्। अग्निः। यः। वनुष्यतः। निऽपाति। सम्ऽएद्धारम्। अंहसः। उरुष्यात्। सुऽजातासः। परि। चरन्ति। वीराः ॥१५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! (यः) जो (अग्निः) अग्नि (वनुष्यतः) याचना करते हुओं की (निपाति) निरन्तर रक्षा करता है तथा (समेद्धारम्) सम्यक् प्रकाशित करानेवाले को (अंहसः) दुःख वा दरिद्रता से (उरुष्यात्) रक्षा करे जिसको (सुजातासः) विद्याओं में अच्छे प्रकार प्रसिद्ध और (वीराः) विज्ञान को प्राप्त हुए वीरपुरुष (परि, चरन्ति) सब ओर से जानते वा प्राप्त होते हैं (सः, इत्) वही अग्नि तुम लोगों को अच्छे प्रकार उपयोग में लाना चाहिये ॥१५॥
Essence
जो मनुष्य अच्छी विद्या से अग्नि का सेवन कर कार्यसिद्ध के लिये संयुक्त करते हैं, वे दुःख और दरिद्रता से रहित, कीर्त्तिवाले हुए विजय के सुख को निरन्तर प्राप्त होते हैं ॥१५॥
Subject
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥