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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 14

104 Sukta
25 Mantra
7/1/14
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सेद॒ग्निर॒ग्नीँरत्य॑स्त्व॒न्यान्यत्र॑ वा॒जी तन॑यो वी॒ळुपा॑णिः। स॒हस्र॑पाथा अ॒क्षरा॑ स॒मेति॑ ॥१४॥

सः । इत् । अ॒ग्निः । अ॒ग्नीन् । अति॑ । अ॒स्तु॒ । अ॒न्यान् । यत्र॑ । वा॒जी । तन॑यः । वी॒ळुऽपा॑णिः । स॒हस्र॑ऽपाथाः । अ॒क्षरा॑ । स॒म्ऽएति॑ ॥

Mantra without Swara
सेदग्निरग्नीँरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वीळुपाणिः। सहस्रपाथा अक्षरा समेति ॥

सः। इत्। अग्निः। अग्नीन्। अति। अस्तु। अन्यान्। यत्र। वाजी। तनयः। वीळुऽपाणिः। सहस्रऽपाथाः। अक्षरा। सम्ऽएति ॥१४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (वाजी) वेगबलादियुक्त (वीळुपाणिः) बलरूप जिस के हाथ हैं (तनयः) पुत्र के तुल्य (अग्निः) अग्नि (यत्र) जहाँ (अन्यान्) अन्य (अग्नीन्) अग्नियों को प्राप्त (अत्यस्तु) अत्यन्त हो (सः, इत्) वही (सहस्रपाथाः) अतोल =अतुलनीय अन्नादि पदार्थोंवाला (अक्षरा) जलों को (समेति) सम्यक् प्राप्त होता है, वहाँ उसको तुम लोग सिद्ध करो ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सुपुत्र पितरों को प्राप्त होता है, वैसे अग्नि अग्नियों को प्राप्त होता है तथा प्रसिद्ध होकर अपने स्वरूप कारण को प्राप्त होकर स्थिर होता है, जो लोग अभिव्याप्त बिजुली के प्रकट करने को जानते हैं, वे असंख्य ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं ॥१४॥
Subject
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥