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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 12

104 Sukta
25 Mantra
7/1/12
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यम॒श्वी नित्य॑मुप॒याति॑ य॒ज्ञं प्र॒जाव॑न्तं स्वप॒त्यं क्षयं॑ नः। स्वज॑न्मना॒ शेष॑सा वावृधा॒नम् ॥१२॥

यम् । अ॒श्वी । नित्य॑म् । उ॒प॒ऽयाति॑ । य॒ज्ञम् । प्र॒जाऽव॑न्तम् । सु॒ऽअ॒प॒त्यम् । क्षय॑म् । नः॒ । स्वऽज॑न्मना । शेष॑सा । व॒वृ॒धा॒नम् ॥

Mantra without Swara
यमश्वी नित्यमुपयाति यज्ञं प्रजावन्तं स्वपत्यं क्षयं नः। स्वजन्मना शेषसा वावृधानम् ॥

यम्। अश्वी। नित्यम्। उपऽयाति। यज्ञम्। प्रजाऽवन्तम्। सुऽअपत्यम्। क्षयम्। नः। स्वऽजन्मना। शेषसा। ववृधानम् ॥१२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जो (अश्वी) बहुत वेगादि गुणोंवाला अग्नि (नः) हमारे (यम्) जिस (प्रजावन्तम्) बहुत प्रजावाले (स्वपत्यम्) सुन्दर बालकों से युक्त (यज्ञम्) संग करने ठहरने योग्य (क्षयम्) घर को वा (स्वजन्मना) अपने जन्म से (शेषसा) शेष रहे भाग से (वावृधानम्) बढ़ते या बढ़ाते हुए के (नित्यम्) नित्य (उपयाति) निकट प्राप्त होता है, उसको तुम लोग जानो ॥१२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अग्नि प्रकट हुए द्वितीय जन्म से प्रजा, सुन्दर सन्तानों और घर को प्राप्त कराता है, उसको प्रसिद्ध करो ॥१२॥
Subject
फिर वह अग्नि क्या सिद्ध करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥