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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 11

104 Sukta
25 Mantra
7/1/11
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा शूने॑ अग्ने॒ नि ष॑दाम नृ॒णां माशेष॑सो॒ऽवीर॑ता॒ परि॑ त्वा। प्र॒जाव॑तीषु॒ दुर्या॑सु दुर्य ॥११॥

मा । शूने॑ । अ॒ग्ने॒ । नि । स॒दा॒म॒ । नृ॒णाम् । मा । अ॒शेष॑सः । अ॒वीर॑ता । परि॑ । त्वा॒ । प्र॒जाऽव॑तीषु । दुर्या॑सु । दु॒र्य॒ ॥

Mantra without Swara
मा शूने अग्ने नि षदाम नृणां माशेषसोऽवीरता परि त्वा। प्रजावतीषु दुर्यासु दुर्य ॥

मा। शूने। अग्ने। नि। सदाम। नृणाम्। मा। अशेषसः। अवीरता। परि। त्वा। प्रजाऽवतीषु। दुर्यासु। दुर्य ॥११॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् ! जो (अवीरता) वीरों का अभाव है उससे (नृणाम्) नायकों में (मा, निषदाम) निरन्तर स्थित न हों (शूने) शीघ्रकारिणी सेना में (अशेषसः) सम्पूर्ण हम (त्वा) तेरे (मा)(परि) सब ओर से निरन्तर स्थित हों। हे (दुर्य्य) घरों में वर्त्तमान ! जिस कारण (प्रजावतीषु) प्रशस्त सन्तानों से युक्त (दुर्यासु) घरों में हुई रीतियों में सुखपूर्वक निरन्तर स्थित हों, वैसा कीजिये ॥११॥
Essence
हे क्षत्रिय-कुल में हुए राजपुरुषो ! तुम कातर मत होओ। विरोध से परस्पर युद्ध करके निःशेष मत होओ। सनातन राजनीति से प्रजाओं का पालन कर कीर्त्तिवाले होओ ॥११॥
Subject
फिर ये राजादि क्या न करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥