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Rigveda Mandal 6 / Sukta 9 / Mantra 5

75 Sukta
7 Mantra
6/9/5
Devata- वैश्वानरः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ध्रु॒वं ज्योति॒र्निहि॑तं दृ॒शये॒ कं मनो॒ जवि॑ष्ठं प॒तय॑त्स्व॒न्तः। विश्वे॑ दे॒वाः सम॑नसः॒ सके॑ता॒ एकं॒ क्रतु॑म॒भि वि य॑न्ति सा॒धु ॥५॥

ध्रु॒वम् । ज्योतिः॑ । निऽहि॑तम् । दृ॒शये॑ । कम् । मनः॑ । जवि॑ष्ठम् । प॒तय॑त्ऽसु । अ॒न्तरिति॑ । विश्वे॑ । दे॒वाः । सऽम॑नसः । सऽके॑ताः । एक॑म् । क्रतु॑म् । अ॒भि । वि । या॒न्ति॒ । सा॒धु ॥

Mantra without Swara
ध्रुवं ज्योतिर्निहितं दृशये कं मनो जविष्ठं पतयत्स्वन्तः। विश्वे देवाः समनसः सकेता एकं क्रतुमभि वि यन्ति साधु ॥

ध्रुवम्। ज्योतिः। निऽहितम्। दृशये। कम्। मनः। जविष्ठम्। पतयत्ऽसु। अन्तरिति। विश्वे। देवाः। सऽमनसः। सऽकेताः। एकम्। क्रतुम्। अभि। वि। यान्ति। साधु ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (दृशये) दर्शन के लिये (ध्रुवम्) निश्चल (निहितम्) स्थित (कम्) सुखस्वरूप (ज्योतिः) अपने से प्रकाशित और सब का प्रकाशक ब्रह्म है, उसके आधार में जो (जविष्ठम्) अतिवेगयुक्त (पतयत्सु) पति सदृश के आचरण करते हुओं में (अन्तः) मध्य में वर्त्तमान (मनः) अन्तःकरण का व्यापार है, उसके आश्रय से (समनसः) सहकारि साधन मन जिनका और (सकेताः) तुल्य बुद्धि जिनकी वे (विश्वे) संपूर्ण (देवाः) अपने-अपने विषयों को प्रकाशित करनेवाली श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ (एकम्) सहायरहित (ऋतुम्) जीव के प्रज्ञान को (साधु) उत्तम प्रकार (अभि) सन्मुख (वि) विशेष करके (यन्ति) प्राप्त होते हैं, यह आप लोग जानो ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस शरीर में सच्चिदानन्दस्वरूप अपने से प्रकाशित ब्रह्म, द्वितीय जीव, तृतीय मन, चौथी इन्द्रियाँ, पाँचवें प्राण, छठा शरीर वर्त्तमान है, ऐसा होने पर सम्पूर्ण व्यवहार सिद्ध होते हैं । जिनके मध्य से सब का आधार ईश्वर, देह, अन्तःकरण प्राण और इन्द्रियों का धारण करनेवाला और जीवादिकों का अधिष्ठान शरीर है, यह जानो ॥५॥
Subject
इस शरीर में क्या-क्या जानने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥