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Rigveda Mandal 6 / Sukta 9 / Mantra 4

75 Sukta
7 Mantra
6/9/4
Devata- वैश्वानरः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒यं होता॑ प्रथ॒मः पश्य॑ते॒ममि॒दं ज्योति॑र॒मृतं॒ मर्त्ये॑षु। अ॒यं स ज॑ज्ञे ध्रु॒व आ निष॒त्तोऽम॑र्त्यस्त॒न्वा॒३॒॑ वर्ध॑मानः ॥४॥

अ॒यम् । होता॑ । प्र॒थ॒मः । पश्य॑त । इ॒मम् । इ॒दम् । ज्योतिः॑ । अ॒मृत॑म् । मर्त्ये॑षु । अ॒यम् । सः । ज॒ज्ञे॒ । ध्रु॒वः । आ । नि॒ऽस॒त्तः । अम॑र्त्यः । त॒न्वा॑ । वर्ध॑मानः ॥

Mantra without Swara
अयं होता प्रथमः पश्यतेममिदं ज्योतिरमृतं मर्त्येषु। अयं स जज्ञे ध्रुव आ निषत्तोऽमर्त्यस्तन्वा३ वर्धमानः ॥

अयम्। होता। प्रथमः। पश्यत। इमम्। इदम्। ज्योतिः। अमृतम्। मर्त्येषु। अयम्। सः। जज्ञे। ध्रुवः। आ। निऽसत्तः। अमर्त्यः। तन्वा। वर्धमानः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जो (ध्रुवः) निश्चल दृढ़ (निषत्तः) स्थित (प्रथमः) पहिला (होता) देने वा ग्रहण करनेवाला (अयम्) यह और (मर्त्येषु) मरणधर्म्मयुक्त शरीरों में (इदम्) इस प्रत्यक्ष (अमृतम्) नाश से रहित (ज्योतिः) सूर्य्य के सदृश अपने से प्रकाशित चेतन परमात्मा है उस (इमम्) इस को (पश्यत) देखिये और जो (अयम्) यह (अमर्त्यः) मरणधर्म्म से रहित (तन्वा) शरीर से (वर्धमानः) बढ़ता हुआ (आ) चारों ओर से (जज्ञे) प्रकट होता है (सः) वह जीव है, ऐसा देखो ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस शरीर में दो चेतन नित्य हुए जीवात्मा और परमात्मा वर्त्तमान हैं। उन दोनों में एक अल्प, और अल्पदेशस्थ जीव है, वह शरीर को धारण करके प्रकट होता, वृद्धि को प्राप्त होता और परिणाम को प्राप्त होता तथा हीन दशा को प्राप्त होता, पाप और पुण्य के फल का भोग करता है। द्वितीय परमेश्वर ध्रुव, निश्चल, सर्वज्ञ, कर्म्मफल के सम्बन्ध से रहित है, ऐसा तुम लोग निश्चय करो ॥४॥
Subject
अब इस देह में दो जीवात्मा और परमात्मा वर्त्तमान हैं, इस विषय को कहते हैं ॥