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Rigveda Mandal 6 / Sukta 8 / Mantra 7

75 Sukta
7 Mantra
6/8/7
Devata- वैश्वानरः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अद॑ब्धेभि॒स्तव॑ गो॒पाभि॑रिष्टे॒ऽस्माकं॑ पाहि त्रिषधस्थ सू॒रीन्। रक्षा॑ च नो द॒दुषां॒ शर्धो॑ अग्ने॒ वैश्वा॑नर॒ प्र च॑ तारीः॒ स्तवा॑नः ॥७॥

अद॑ब्धेभिः । तव॑ । गो॒पाभिः॑ । इ॒ष्टे॒ । अ॒स्माक॑म् । पा॒हि॒ । त्रि॒ऽस॒द॒स्थ॒ । सू॒रीन् । रक्ष॑ । च॒ । नः॒ । द॒दुषा॑म् । शर्धः॑ । अ॒ग्ने॒ । वैश्वा॑नर । प्र । च॒ । ता॒रीः॒ । स्तवा॑नः ॥

Mantra without Swara
अदब्धेभिस्तव गोपाभिरिष्टेऽस्माकं पाहि त्रिषधस्थ सूरीन्। रक्षा च नो ददुषां शर्धो अग्ने वैश्वानर प्र च तारीः स्तवानः ॥

अदब्धेभिः। तव। गोपाभिः। इष्टे। अस्माकम्। पाहि। त्रिऽसदस्थ। सूरीन्। रक्ष। च। नः। ददुषाम्। शर्धः। अग्ने। वैश्वानर। प्र। च। तारीः। स्तवानः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे (त्रिषधस्थ) तीन तुल्य स्थानों में वर्त्तमान (इष्टे) मेल करने योग्य (वैश्वानर) विद्या और विनय से प्रकाशमान (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान ! (स्तवानः) प्रशंसा करते हुए आप (अदब्धेभिः) अहिंसक जनों से (गोपाभिः) रक्षाओं के द्वारा (नः) हम लोगों के (सूरीन्) विद्वानों का (पाहि) पालन करिये और (अस्माकम्) हम लोगों के सम्बन्धियों की (च) भी (रक्षा) रक्षा करिये तथा (तव) आपका और (ददुषाम्) देनेवालों का (च) और हमारा (शर्धः) बल बढ़े और हम लोगों के साथ आप शत्रुओं का (प्र, तारीः) उल्लङ्घन करो ॥७॥
Essence
हे राजजन ! जैसे सूर्य्य ऊपर, नीचे और मध्यस्थ लोकों को प्रकाशित करता है, वैसे ही प्रजाजनों की आप सब प्रकार से रक्षा कीजिये और जैसे इस राज्य में विद्वान् बढ़ें, वैसे कार्य करिये ॥७॥ इस सूक्त में विद्या और विनय से प्रकाशमान, विद्वान्, सूर्य्य और राजा आदि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह आठवाँ सूक्त और दसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजा आदि जनों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥