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Rigveda Mandal 6 / Sukta 8 / Mantra 4

75 Sukta
7 Mantra
6/8/4
Devata- वैश्वानरः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षा अ॑गृभ्णत॒ विशो॒ राजा॑न॒मुप॑ तस्थुर्ऋ॒ग्मिय॑म्। आ दू॒तो अ॒ग्निम॑भरद्वि॒वस्व॑तो वैश्वान॒रं मा॑त॒रिश्वा॑ परा॒वतः॑ ॥४॥

अ॒पाम् । उ॒पऽस्थे॑ । म॒हि॒षाः । अ॒गृ॒भ्ण॒त॒ । विशः॑ । राजा॑नम् । उप॑ । त॒स्थुः॒ । ऋ॒ग्मिय॑म् । आ । दू॒तः । अ॒ग्निम् । अ॒भ॒र॒त् । वि॒वस्व॑तः । वै॒श्वा॒न॒रम् । मा॒त॒रिश्वा॑ । प॒रा॒ऽवतः॑ ॥

Mantra without Swara
अपामुपस्थे महिषा अगृभ्णत विशो राजानमुप तस्थुर्ऋग्मियम्। आ दूतो अग्निमभरद्विवस्वतो वैश्वानरं मातरिश्वा परावतः ॥

अपाम्। उपऽस्थे। महिषाः। अगृभ्णत। विशः। राजानम्। उप। तस्थुः। ऋग्मियम्। आ। दूतः। अग्निम्। अभरत्। विवस्वतः। वैश्वानरम्। मातरिश्वा। पराऽवतः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! जो (दूतः) सन्तापित करानेवाला (मातरिश्वा) अन्तरिक्ष में शयन करनेवाला वायु (परावतः) दूर स्थित (विवस्वतः) सूर्य्य के (वैश्वानरम्) सर्वत्र प्रकाशमान (अग्निम्) अग्नि को (अभरत्) धारण करता और जिस (ऋग्मियम्) ऋचाओं द्वारा प्रमाण किया जाता उस (राजानम्) जैसे राजा का, वैसे सूर्य को (विशः) प्रजायें (उप) समीप में (आ) चारों ओर से (तस्थुः) प्राप्त होती हैं, वैसे सूर्य्य उपस्थित होता है और जिस (अपाम्) प्राणों वा जलों के (उपस्थे) समीप में वर्त्तमान का (महिषाः) बड़े जन (अगृभ्णत) ग्रहण करते हैं, उस वायु को आप लोग जानिये ॥४॥
Essence
जैसे वायु दूर वर्त्तमान भी सूर्य्य के तेज को धारण करता है, वैसे उत्तम राजा दूर स्थित भी प्रजाओं का पोषण करे ॥४॥
Subject
फिर वह वायु कैसा है और क्या करता है, इस विषय को कहते हैं ॥