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Rigveda Mandal 6 / Sukta 8 / Mantra 2

75 Sukta
7 Mantra
6/8/2
Devata- वैश्वानरः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स जाय॑मानः पर॒मे व्यो॑मनि व्र॒तान्य॒ग्निर्व्र॑त॒पा अ॑रक्षत। व्य१॒॑न्तरि॑क्षममिमीत सु॒क्रतु॑र्वैश्वान॒रो म॑हि॒ना नाक॑मस्पृशत् ॥२॥

सः । जाय॑मानः । प॒र॒मे । विऽओ॑मनि । व्र॒तानि॑ । अ॒ग्निः । व्र॒त॒ऽपाः । अ॒र॒क्ष॒त॒ । वि । अ॒न्तरि॑क्षम् । अ॒मि॒मी॒त॒ । सु॒ऽक्रतुः॑ । वै॒श्वा॒न॒रः । म॒हि॒ना । नाक॑म् । अ॒स्पृ॒श॒त् ॥

Mantra without Swara
स जायमानः परमे व्योमनि व्रतान्यग्निर्व्रतपा अरक्षत। व्य१न्तरिक्षममिमीत सुक्रतुर्वैश्वानरो महिना नाकमस्पृशत् ॥

सः। जायमानः। परमे। विऽओमनि। व्रतानि। अग्निः। व्रतऽपाः। अरक्षत। वि। अन्तरिक्षम्। अमिमीत। सुऽक्रतुः। वैश्वानरः। महिना। नाकम्। अस्पृशत् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! आप लोगों को जो (व्रतपाः) कर्म्मों की रक्षा करनेवाला (अग्निः) अग्नि (परमे) श्रेष्ठ और (व्योमनि) आकाश के सदृश व्यापक परमेश्वर में (जायमानः) उत्पन्न होता हुआ (व्रतानि) सत्यभाषण आदि कर्म्मों की (अरक्षत) रक्षा करता तथा (अन्तरिक्षम्) जल की (वि) विशेष करके (अमिमीत) रक्षा करता और (सुक्रतुः) अच्छे कर्म्मोंवाला (वैश्वानरः) सम्पूर्ण मनुष्यों में प्रकाशमान होता हुआ (महिना) महत्त्व से (नाकम्) दुःखरहित का (अस्पृशत्) स्पर्श करता है (सः) वह जानने योग्य है ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस परमेश्वर ने अपने में सूर्य्य आदि लोकों के निर्म्माण से सब का उपकार किया, उसके सत्य कर्म्मों का अनुष्ठान करके उपासना करो अर्थात् उसी का भजन करो ॥२॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥