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Rigveda Mandal 6 / Sukta 75 / Mantra 11

75 Sukta
19 Mantra
6/75/11
Devata- इषवः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒प॒र्णं व॑स्ते मृ॒गो अ॑स्या॒ दन्तो॒ गोभिः॒ संन॑द्धा पतति॒ प्रसू॑ता। यत्रा॒ नरः॒ सं च॒ वि च॒ द्रव॑न्ति॒ तत्रा॒स्मभ्य॒मिष॑वः॒ शर्म॑ यंसन् ॥११॥

सु॒ऽप॒र्णम् । व॒स्ते॒ । मृ॒गः । अ॒स्याः॒ । दन्तः॑ । गोभिः॑ । सम्ऽन॑द्धा । प॒त॒ति॒ । प्रऽसू॑ता । यत्र॑ । नरः॒ । सम् । च॒ । वि । च॒ । द्रव॑न्ति । तत्र॑ । अ॒स्मभ्य॑म् । इष॑वः । शर्म॑ । यं॒स॒न् ॥

Mantra without Swara
सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता। यत्रा नरः सं च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यंसन् ॥

सुऽपर्णम्। वस्ते। मृगः। अस्याः। दन्तः। गोभिः। सम्ऽनद्धा। पतति। प्रऽसूता। यत्र। नरः। सम्। च। वि। च। द्रवन्ति। तत्र। अस्मभ्यम्। इषवः। शर्म। यंसन् ॥११॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (गोभिः) किरण वा धेनुओं से (सन्नद्धा) अच्छे प्रकार से बंधी और (प्रसूता) उत्पन्न हुई भूमि (मृगः) मृग के समान (पतति) जाती है (अस्याः) इसके बीच (दन्तः) जिससे डशते हैं वह दाँत वर्त्तमान है जो (सुपर्णम्) सुन्दर पालना करनेवाले को (वस्ते) उढ़ाता है और (यत्रा) जिस संग्राम में (नरः) योद्धा नर (च) भी (सम्, द्रवन्ति) अच्छे प्रकार दौड़ते हैं (च) और (वि) विशेष धावन करते हैं (तत्र) वहाँ (इषवः) बाण (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (शर्म) सुख जैसे (यंसन्) देवें, वैसा अनुष्ठान करो ॥११॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो भूमि परमेश्वर ने पालना के लिये बनाई है और मृग के समान शीघ्र जाती है तथा जिसके लिये सङ्ग्राम होता है, उसकी प्राप्ति के निमित्त वीरता का संग्र­ह करो ॥११॥
Subject
फिर भूमि कैसी वेगवाली है और युद्ध करनेवाले युद्ध क्यों करते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥