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Rigveda Mandal 6 / Sukta 75 / Mantra 1

75 Sukta
19 Mantra
6/75/1
Devata- वर्म Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जी॒मूत॑स्येव भवति॒ प्रती॑कं॒ यद्व॒र्मी याति॑ स॒मदा॑मु॒पस्थे॑। अना॑विद्धया त॒न्वा॑ जय॒ त्वं स त्वा॒ वर्म॑णो महि॒मा पि॑पर्तु ॥१॥

जी॒मूत॑स्यऽइव । भ॒व॒ति॒ । प्रती॑कम् । यत् । व॒र्मी । याति॑ । स॒ऽमदा॑म् । उ॒पऽस्थे॑ । अना॑विद्धया । त॒न्वा॑ । ज॒य॒ । त्वम् । सः । त्वा॒ । वर्म॑णः । म॒हि॒मा । पि॒प॒र्तु॒ ॥

Mantra without Swara
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे। अनाविद्धया तन्वा जय त्वं स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु ॥

जीमूतस्यऽइव। भवति। प्रतीकम्। यत्। वर्मी। याति। सऽमदाम्। उपऽस्थे। अनाविद्धया। तन्वा। जय। त्वम्। सः। त्वा। वर्मणः। महिमा। पिपर्तु ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे वीर ! (यत्) जो (जीमूतस्येव) मेघ के समान (प्रतीकम्) प्रतीति करनेवाला वर्म (भवति) होता है, उससे (वर्मी) कवचधारी होकर (समदाम्) अहङ्कारों के साथ वर्त्तमान सङ्ग्रामों के (उपस्थे) समीप (याति) जाता है तथा (अनाविद्धया) शस्त्रास्त्ररहित अर्थात् अनविधे (तन्वा) शरीर से (त्वम्) तुम शत्रुओं को (जय) जीतो (सः) सो (वर्मणः) कवच का (महिमा) महत्त्व (त्वा) तुम्हें (पिपर्तु) पाले ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मेघ के समान सुन्दर कवचों को धारण कर युद्ध करते हैं, वे घाव से रहित शरीरवाले हुए वैरियों को जीत सकते हैं, जिस-जिस प्रकार से शरीर में घाव करनेवाले नोकदार शस्त्र न प्राप्त हों, उन-उन उपायों का वीरजन सदैव आश्रय करें ॥१॥
Subject
अब उन्नीस ऋचावाले पचहत्तरवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में शूरवीर किसे धारण कर क्या-क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥