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Rigveda Mandal 6 / Sukta 73 / Mantra 2

75 Sukta
3 Mantra
6/73/2
Devata- बृहस्पतिः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
जना॑य चि॒द्य ईव॑त उ लो॒कं बृह॒स्पति॑र्दे॒वहू॑तौ च॒कार॑। घ्नन्वृ॒त्राणि॒ वि पुरो॑ दर्दरीति॒ जय॒ञ्छत्रूँ॑र॒मित्रा॑न्पृ॒त्सु साह॑न् ॥२॥

जना॑य । चि॒त् । यः । ईव॑ते । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । बृह॒स्पतिः॑ । दे॒वऽहू॑तौ । च॒कार॑ । घ्नन् । वृ॒त्राणि॑ । वि । पुरः॑ । द॒र्द॒री॒ति॒ । जय॑न् । शत्रू॑न् । अ॒मित्रा॑न् । पृ॒त्ऽसु । साह॑न् ॥

Mantra without Swara
जनाय चिद्य ईवत उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार। घ्नन्वृत्राणि वि पुरो दर्दरीति जयञ्छत्रूँरमित्रान्पृत्सु साहन् ॥

जनाय। चित्। यः। ईवते। ऊँ इति। लोकम्। बृहस्पतिः। देवऽहूतौ। चकार। घ्नन्। वृत्राणि। वि। पुरः। दर्दरीति। जयन्। शत्रून्। अमित्रान्। पृत्ऽसु। साहन् ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (देवहूतौ) विद्वानों के बुलाने में (बृहस्पतिः) बड़ों की पालना करनेवाले सूर्यलोक के समान (ईवते) समीप आनेवाले (जनाय) मनुष्य के लिये (लोकम्) देखने योग्य सुख वा स्थान को प्रकाशित (चकार) करता है तथा (पृत्सु) सङ्ग्रामों में (साहन्) सहन करता हुआ (अमित्रान्) विरोधी उदासीन जनों को (जयन्) जीतता और (शत्रून्) शत्रुओं को (घ्नन्) मारता हुआ (वृत्राणि) धनों को प्राप्त होता हुआ (पुरः) शत्रुओं के नगरों को (वि, दर्दरीति) निरन्तर विदीर्ण करता है वह (उ, चित्) ही सेनापति होने योग्य है ॥२॥
Essence
हे राजन् ! जो न्याय से प्रजा पालने के लिये प्रसन्न, पूर्णशरीरात्मबलयुक्त वीर, विद्वान् होवें, वे सेनापति हों जिससे शत्रुओं के जीतने और उनकी सेना के सहने और उसे छिन्न-भिन्न करने तथा विजय और धन को पाने को समर्थ हों ॥२॥
Subject
फिर उस राजा को कैसे सेना के अधिकारी करने चाहियें, इस विषय को कहते हैं ॥