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Rigveda Mandal 6 / Sukta 72 / Mantra 5

75 Sukta
5 Mantra
6/72/5
Devata- इन्द्रासोमौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑सोमा यु॒वम॒ङ्ग तरु॑त्रमपत्य॒साचं॒ श्रुत्यं॑ रराथे। यु॒वं शुष्मं॒ नर्यं॑ चर्ष॒णिभ्यः॒ सं वि॑व्यथुः पृतना॒षाह॑मुग्रा ॥५॥

इन्द्रा॑सोमा । यु॒वम् । अ॒ङ्ग । तरु॑त्रम् । अ॒प॒त्य॒ऽसाच॑म् । श्रुत्य॑म् । र॒रा॒थे॒ इति॑ । यु॒वम् । शुष्म॑म् । नर्य॑म् । च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑ । सम् । वि॒व्य॒थुः॒ । पृ॒त॒ना॒ऽसह॑म् । उ॒ग्रा॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रासोमा युवमङ्ग तरुत्रमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथे। युवं शुष्मं नर्यं चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनाषाहमुग्रा ॥

इन्द्रासोमा। युवम्। अङ्ग। तरुत्रम्। अपत्यऽसाचम्। श्रुत्यम्। रराथे इति। युवम्। शुष्मम्। नर्यम्। चर्षणिऽभ्यः। सम्। विव्यथुः। पृतनाऽसहम्। उग्रा ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 16 Mantra » 5

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Meaning
हे (अङ्ग) हे मित्र अध्यापक और उपदेशक ! (युवम्) तुम दोनों (इन्द्रासोमा) वायु और बिजुली के समान वर्त्तमान (तरुत्रम्) दुःख से तारने और (अपत्यसाचम्) सन्तान के बीच व्याप्त होनेवाले (श्रुत्यम्) श्रवणों में उत्तम ज्ञान को (रराथे) देओ और (युवम्) तुम दोनों (चर्षणिभ्यः) मनुष्यों के लिये (उग्रा) तेजस्वी होते हुए (पृतनाषाहम्) सेनाओं को सहनेवाले (नर्यम्) मनुष्यों में उत्तम (शुष्मम्) बल को (सम्, विव्यथुः) अच्छे प्रकार युक्त करो ॥५॥
Essence
हे अध्यापक वा उपदेशको ! आप लोग पवन और बिजुली के समान सर्वत्र अनुकूलता से सङ्गवाले होते हुए उत्तम सन्तानों को उत्पन्न कर मनुष्यों के हित करनेवाले शरीर और आत्मा के बल को उत्पन्न करें, जिससे शत्रुओं की सेना को सह सकें ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, सोम, अध्यापक और उपदेशकों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बहत्तरवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वे किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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