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Rigveda Mandal 6 / Sukta 72 / Mantra 4

75 Sukta
5 Mantra
6/72/4
Devata- इन्द्रासोमौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑सोमा प॒क्वमा॒मास्व॒न्तर्नि गवा॒मिद्द॑धथुर्व॒क्षणा॑सु। ज॒गृ॒भथु॒रन॑पिनद्धमासु॒ रुश॑च्चि॒त्रासु॒ जग॑तीष्व॒न्तः ॥४॥

इन्द्रा॑सोमा । प॒क्वम् । आ॒मासु॑ । अ॒न्तः । नि । गवा॑म् । इत् । द॒ध॒थुः॒ । व॒क्षणा॑सु । ज॒गृ॒भथुः॑ । अन॑पिऽनद्धम् । आ॒सु॒ । रुश॑त् । चि॒त्रासु॑ । जग॑तीषु । अ॒न्तरिति॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रासोमा पक्वमामास्वन्तर्नि गवामिद्दधथुर्वक्षणासु। जगृभथुरनपिनद्धमासु रुशच्चित्रासु जगतीष्वन्तः ॥

इन्द्रासोमा। पक्वम्। आमासु। अन्तः। नि। गवाम्। इत्। दधथुः। वक्षणासु। जगृभथुः। अनपिऽनद्धम्। आसु। रुशत्। चित्रासु। जगतीषु। अन्तरिति ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 16 Mantra » 4

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Meaning
हे अध्यापक और उपदेशको ! तुम दोनों जैसे (इन्द्रासोमा) पवन और बिजुली (आमासु) न पकी हुई सामग्रियों के (अन्तः) बीच (पक्वम्) पाक को (नि, दधथुः) स्थापन करते हैं और (गवाम्) किरणों के बीच (इत्) निश्चित तथा (आसु) इन (वक्षणासु) नदियों में (अनपिनद्धम्) खुला हुआ (जगृभथुः) ग्रहण करते हैं तथा इन (चित्रासु) अद्भुत (जगतीषु) सृष्टियों के (अन्तः) बीच (रुशत्) सुरूप को धारण करते हैं, वैसे तुम वर्तो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो बिजुली और सोम के समान सब में दृढ़ ज्ञान स्थापन कर नदी के प्रवाह के तुल्य आगे चलाते हैं, वे संसार में कल्याण करनेवाले होते हैं ॥४॥
Subject
फिर वे किसके तुल्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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