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Rigveda Mandal 6 / Sukta 71 / Mantra 2

75 Sukta
6 Mantra
6/71/2
Devata- सविता Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ व॒यं स॑वि॒तुः सवी॑मनि॒ श्रेष्ठे॑ स्याम॒ वसु॑नश्च दा॒वने॑। यो विश्व॑स्य द्वि॒पदो॒ यश्चतु॑ष्पदो नि॒वेश॑ने प्रस॒वे चासि॒ भूम॑नः ॥२॥

दे॒वस्य॑ । व॒यम् । स॒वि॒तुः । सवी॑मनि । श्रेष्ठे॑ । स्या॒म॒ । वसु॑नः । च॒ । दा॒वने॑ । यः । विश्व॑स्य । द्वि॒ऽपदः॑ । यः । चतुः॑ऽपदः । नि॒ऽवेश॑ने । प्र॒ऽस॒वे । च॒ । असि॑ । भूम॑नः ॥

Mantra without Swara
देवस्य वयं सवितुः सवीमनि श्रेष्ठे स्याम वसुनश्च दावने। यो विश्वस्य द्विपदो यश्चतुष्पदो निवेशने प्रसवे चासि भूमनः ॥

देवस्य। वयम्। सवितुः। सवीमनि। श्रेष्ठे। स्याम। वसुनः। च। दावने। यः। विश्वस्य। द्विऽपदः। यः। चतुःऽपदः। निऽवेशने। प्रऽसवे। च। असि। भूमनः ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् राजा ! (यः) जो (द्विपदः) मनुष्यादि दो पगवाले जीव और (यः) जो (चतुष्पदः) गो आदि चार पगवाले पशु आदि जीवों के (भूमनः) बहुरूपी (विश्वस्य) समग्र संसार के (प्रसवे) उस उत्पन्न हुए स्थान में (निवेशने) जिसमें सब निवेश करते हैं अभिव्याप्त होकर विराजमान हैं, उस (सवितुः) सकल जगत् के उत्पन्न करनेवाले (देवस्य) अपने आप प्रकाशमान परमेश्वर के (श्रेष्ठे) प्रशंसित व्यवहार में (सवीमनि) उत्पन्न हुए जगत् में (वसुनः, च) धन के भी (दावने) देने में जैसे (वयम्) हम लोग उद्यत (स्याम) हों, वैसे तुम (च) भी जिस कारण (असि) हो, इससे यहाँ राजा होओ ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जैसे इस जगत् में जगदीश्वर अभिव्याप्त होकर सब की रक्षा करता है, वैसे ही इस जगत् में व्याप्त होकर विद्या और विनय से समस्त राज्य को पुत्र के समान पालो ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥