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Rigveda Mandal 6 / Sukta 7 / Mantra 4

75 Sukta
7 Mantra
6/7/4
Devata- वैश्वानरः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वां विश्वे॑ अमृत॒ जाय॑मानं॒ शिशुं॒ न दे॒वा अ॒भि सं न॑वन्ते। तव॒ क्रतु॑भिरमृत॒त्वमा॑य॒न्वैश्वा॑नर॒ यत्पि॒त्रोरदी॑देः ॥४॥

त्वाम् । विश्वे॑ । अ॒मृ॒त॒ । जाय॑मानम् । शिशु॑म् । न । दे॒वाः । अ॒भि । सम् । न॒व॒न्ते॒ । तव॑ । क्रतु॑ऽभिः । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आ॒य॒न् । वैश्वा॑नर । यत् । पि॒त्रोः । अदी॑देः ॥

Mantra without Swara
त्वां विश्वे अमृत जायमानं शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते। तव क्रतुभिरमृतत्वमायन्वैश्वानर यत्पित्रोरदीदेः ॥

त्वाम्। विश्वे। अमृत। जायमानम्। शिशुम्। न। देवाः। अभि। सम्। नवन्ते। तव। क्रतुऽभिः। अमृतऽत्वम्। आयन्। वैश्वानर। यत्। पित्रोः। अदीदेः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 9 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वैश्वानर) संपूर्ण जनों को धर्म्म के कार्य्यों में ले चलनेवाले (अमृत) मरणधर्म्म से रहित यथार्थवक्ता विद्वान् ! जिन (त्वाम्) आपको (शिशुम्) बालक को (न) जैसे वैसे (जायमानम्) उत्पन्न हुए को (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (अभि) सब ओर से (सम्) उत्तम प्रकार (नवन्ते) स्तुति करते हैं और जिन (तव) आपके (क्रतुभिः) बुद्धि के कर्म्मों से मनुष्य लोग (अमृतत्वम्) मोक्षपन को (आयन्) प्राप्त होते हैं और (यत्) जो आप (पित्रोः) माता और पिता के सदृश विद्या और आचार्य्य के (अदीदेः) प्रकाशक हो, वह आप धन्य हो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य माता और पिता से जन्म को प्राप्त होकर आठवें वर्ष से प्रारम्भ करके आचार्य से विद्या के ग्रहण से द्वितीय जन्म को प्राप्त होते हैं, वे स्तुति करने योग्य हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करने को समर्थ होते हैं ॥४॥
Subject
अब द्वितीय जन्म के विषय को कहते हैं ॥