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Rigveda Mandal 6 / Sukta 68 / Mantra 8

75 Sukta
11 Mantra
6/68/8
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नू न॑ इन्द्रावरुणा गृणा॒ना पृ॒ङ्क्तं र॒यिं सौ॑श्रव॒साय॑ देवा। इ॒त्था गृ॒णन्तो॑ म॒हिन॑स्य॒ शर्धो॒ऽपो न ना॒वा दु॑रि॒ता त॑रेम ॥८॥

नु । नः॒ । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । गृ॒णा॒ना । पृ॒ङ्क्तम् । र॒यिम् । सौ॒श्र॒व॒साय॑ । दे॒वा॒ । इ॒त्था । गृ॒णन्तः॑ । म॒हिन॑स्य । शर्धः॑ । अ॒पः । न । ना॒वा । दुः॒ऽइ॒ता । त॒रे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
नू न इन्द्रावरुणा गृणाना पृङ्क्तं रयिं सौश्रवसाय देवा। इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्धोऽपो न नावा दुरिता तरेम ॥

नु। नः। इन्द्रावरुणा। गृणाना। पृङ्क्तम्। रयिम्। सौश्रवसाय। देवा। इत्था। गृणन्तः। महिनस्य। शर्धः। अपः। न। नावा। दुःऽइता। तरेम ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्रावरुणा) सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य वर्त्तमान (नः) हम लोगों को (गृणाना) प्रशंसा करने और (देवा) देनेवाले राजप्रजाजनो ! जैसे तुम दोनों (सौश्रवसाय) उत्तम यश होने के लिये (रयिम्) धन का (पृङ्क्तम्) सम्बन्ध करो (इत्था) ऐसे (महिनस्य) बड़े के (शर्धः) बल की (गृणन्तः) प्रशंसा करते हुए हम लोग (नावा) नाव से (अपः) जलों को (न) जैसे वैसे (दुरिता) दुःख से उल्लङ्घन करने योग्य कष्टों को (नू) शीघ्र (तरेम) तरें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो राजप्रजाजन आपस में प्रीतिवाले होकर अन्नादि पदार्थों के लिये धन इकट्ठा करते हैं, वे सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य प्रतापी होकर जैसे बड़ी नौका से दुःख से तरने योग्य समुद्रों को जन पार होते हैं, वैसे ही बड़े बड़े दुःख और दारिद्र्यों को शीघ्र तरते हैं ॥८॥
Subject
फिर वे राजप्रजाजन कैसे वर्त्तें, इस विषय को कहते हैं ॥