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Rigveda Mandal 6 / Sukta 68 / Mantra 4

75 Sukta
11 Mantra
6/68/4
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ग्नाश्च॒ यन्नर॑श्च वावृ॒धन्त॒ विश्वे॑ दे॒वासो॑ न॒रां स्वगू॑र्ताः। प्रैभ्य॑ इन्द्रावरुणा महि॒त्वा द्यौश्च॑ पृथिवि भूतमु॒र्वी ॥४॥

ग्नाः । च॒ । यत् । नरः॑ । च॒ । व॒वृ॒धन्त॑ । विश्वे॑ । दे॒वासः॑ । न॒राम् । स्वऽगू॑र्ताः । प्र । ए॒भ्यः॒ । इ॒न्द्रा॒व॒रु॒णा॒ । म॒हि॒ऽत्वा । द्यौः । च॒ । पृ॒थि॒वि॒ । भू॒त॒म् । उ॒र्वी इति॑ ॥

Mantra without Swara
ग्नाश्च यन्नरश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वगूर्ताः। प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा द्यौश्च पृथिवि भूतमुर्वी ॥

ग्नाः। च। यत्। नरः। च। ववृधन्त। विश्वे। देवासः। नराम्। स्वऽगूर्ताः। प्र। एभ्यः। इन्द्रावरुणा। महिऽत्वा। द्यौः। च। पृथिवि। भूतम्। उर्वी इति ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो (विश्वे, देवासः) समस्त विद्वान् जन (नरः, च) और विद्वानों के बीच अग्रगामी (स्वगूर्त्ताः) अपने पराक्रम से उद्यमी जन (नराम्) मनुष्यों की (ग्नाः) वाणी तथा अपनी (च) भी वाणियों को प्राप्त होकर (वावृधन्त) सब ओर से बढ़ते हैं (प्र, एभ्यः) उत्कर्षण से इनसे (इन्द्रावरुणा) बिजुली और सूर्य्य के समान वा (उर्वी) विस्तृत (पृथिवि) पृथिवी (द्यौः, च) और प्रकाश के समान वर्त्तमान (महित्वा) महिमा से (भूतम्) प्रसिद्ध होवें। वे सब जन मनुष्यों से सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जो विद्या, धर्म और विनय से बढ़ते हैं, उन उद्यमियों के साथ इन प्रजाजनों की पालना करो ॥४॥
Subject
फिर वे किन के साथ क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥