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Rigveda Mandal 6 / Sukta 68 / Mantra 2

75 Sukta
11 Mantra
6/68/2
Devata- इन्द्रावरुणौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ता हि श्रेष्ठा॑ दे॒वता॑ता तु॒जा शूरा॑णां॒ शवि॑ष्ठा॒ ता हि भू॒तम्। म॒घोनां॒ मंहि॑ष्ठा तुवि॒शुष्म॑ ऋ॒तेन॑ वृत्र॒तुरा॒ सर्व॑सेना ॥२॥

ता । हि । श्रेष्ठा॑ । दे॒वऽता॑ता । तु॒जा । शूरा॑णाम् । शवि॑ष्ठा । ता । हि । भू॒तम् । म॒घोना॑म् । मंहि॑ष्ठा । तु॒वि॒ऽशुष्मा॑ । ऋ॒तेन॑ । वृ॒त्र॒ऽतुरा॑ । सर्व॑ऽसेना ॥

Mantra without Swara
ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम्। मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना ॥

ता। हि। श्रेष्ठा। देवऽताता। तुजा। शूराणाम्। शविष्ठा। ता। हि। भूतम्। मघोनाम्। मंहिष्ठा। तुविऽशुष्मा। ऋतेन। वृत्रऽतुरा। सर्वऽसेना ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 11 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (हि) ही (देवताता) सत्यव्यवहार यज्ञ में (श्रेष्ठा) उत्तम (तुजा) दुष्टों की हिंसा करनेवाले (शूराणाम्) निर्भय जनों में (शविष्ठा) अतीव बलवान् (भूतम्) होते हैं और जो (हि) निश्चय के साथ (मघोनाम्) धनाढ्यों के बीच (मंहिष्ठा) अतीव सत्कार करने योग्य (ऋतेन) सत्य आचरण से (तुविशुष्मा) बहुत बल और सेना से युक्त (वृत्रतुरा) जो मेघ के समान बढ़े हुए शत्रुओं का विनाश करनेवाले (सर्वसेना) समग्र सेनाओं से युक्त सभा और सेनाधीश वर्त्तमान हैं (ता) वे सत्कार करने योग्य हैं और (ता) वे ही उत्तम अधिकार में स्थापन करने योग्य हैं ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सत्य न्याय से प्रजा की पालना करने में प्रयत्न करते हुए, सब प्रकार की विद्या और सर्वोत्तम सेनाओं से युक्त, दुष्टों की हिंसा से श्रेष्ठ, धनाढ्य और वीर-पुरुषों की रक्षा करनेवाले होवें, वे धन्यवाद के योग्य हैं ॥२॥
Subject
फिर कौन यहाँ राजजन उत्तम और सत्कार करने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥