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Rigveda Mandal 6 / Sukta 67 / Mantra 5

75 Sukta
11 Mantra
6/67/5
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वे॒ यद्वां॑ मं॒हना॒ मन्द॑मानाः क्ष॒त्रं दे॒वासो॒ अद॑धुः स॒जोषाः॑। परि॒ यद्भू॒थो रोद॑सी चिदु॒र्वी सन्ति॒ स्पशो॒ अद॑ब्धासो॒ अमू॑राः ॥५॥

विश्वे॑ । यत् । वा॒म् । मं॒हना॑ । मन्द॑मानाः । क्ष॒त्रम् । दे॒वासः॑ । अद॑धुः । स॒ऽजोषाः॑ । परि॑ । यत् । भू॒थः । रोद॑सी॒ इति॑ । चि॒त् । उ॒र्वी इति॑ । सन्ति॑ । स्पशः॑ । अद॑ब्धासः । अमू॑राः ॥

Mantra without Swara
विश्वे यद्वां मंहना मन्दमानाः क्षत्रं देवासो अदधुः सजोषाः। परि यद्भूथो रोदसी चिदुर्वी सन्ति स्पशो अदब्धासो अमूराः ॥

विश्वे। यत्। वाम्। मंहना। मन्दमानाः। क्षत्रम्। देवासः। अदधुः। सऽजोषाः। परि। यत्। भूथः। रोदसी इति। चित्। उर्वी इति। सन्ति। स्पशः। अदब्धासः। अमूराः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापक और उपदेशको ! (यत्) जो तुम दोनों (उर्वी) बहुत पदार्थों से युक्त (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी के समान विद्या और क्षमा से युक्त (भूथः) होते हो उन (वाम्) तुम्हारे सङ्ग से (यत्) जो (मंहना) सत्कार करनेवाले (मन्दमानाः) आनन्द वा सत्कार को प्राप्त वा स्तुति करते (सजोषाः) एकसी प्रीति को सेवनेवाले (स्पशः) अविद्यान्धकार का विनाश करने और विद्याप्रकाश का स्पर्श करनेवाले (अदब्धासः) हिंसा को न प्राप्त और हिंसा न करनेवाले (अमूराः) मूढ़तादि दोषरहित (विश्वे, देवासः) समस्त कामना करते हुए विद्वान् जन (सन्ति) हैं, वे ही (चित्) निश्चित (क्षत्रम्) धन वा राज्य को (परि, अदधुः) सब ओर से धारण करते हैं, उनका वा उन तुम लोगों का सब हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥५॥
Essence
वे ही आप्त विद्वान् जन हैं, जिनका पढ़ाना, उपदेश और सङ्ग शीघ्र सफल होता है, जिनके सङ्ग से हिंसा आदि दोषरहित विद्वान् होकर पक्षपात को छोड़ सब प्राणियों को अपने आत्मा के तुल्य सुख देते हैं ॥५॥
Subject
फिर मनुष्यों को कौन सत्कार करने योग्य हैं, इस विषय को कहते हैं ॥