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Rigveda Mandal 6 / Sukta 67 / Mantra 11

75 Sukta
11 Mantra
6/67/11
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒वोरि॒त्था वां॑ छ॒र्दिषो॑ अ॒भिष्टौ॑ यु॒वोर्मि॑त्रावरुणा॒वस्कृ॑धोयु। अनु॒ यद्गावः॑ स्फु॒रानृ॑जि॒प्यं धृ॒ष्णुं यद्रणे॒ वृष॑णं यु॒नज॑न् ॥११॥

अ॒वोः । इ॒त्था । वा॒म् । छ॒र्दिषः॑ । अ॒भिष्टौ॑ । यु॒वोः । मि॒त्रा॒व॒रु॒णौ । अस्कृ॑धोयु । अनु॑ । यत् । गावः॑ । स्फु॒रान् । ऋ॒जि॒प्यम् । धृ॒ष्णुम् । यत् । रणे॑ । वृष॑णम् । यु॒नज॑न् ॥

Mantra without Swara
अवोरित्था वां छर्दिषो अभिष्टौ युवोर्मित्रावरुणावस्कृधोयु। अनु यद्गावः स्फुरानृजिप्यं धृष्णुं यद्रणे वृषणं युनजन् ॥

अवोः। इत्था। वाम्। छर्दिषः। अभिष्टौ। युवोः। मित्रावरुणौ। अस्कृधोयु। अनु। यत्। गावः। स्फुरान्। ऋजिप्यम्। धृष्णुम्। यत्। रणे। वृषणम्। युनजन् ॥११॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापक और उपदेशको ! (यत्) जो (गावः) किरणें वा धेनु हैं उनको (स्फुरान्) स्फूर्त्तिवाले पदार्थों वा (ऋजिप्यम्) कोमल वा सरल पदार्थों के पालनेवालों में हुए (धृष्णुम्) दृढ़ प्रगल्भ (वृषणम्) बलिष्ठ को (रणे) सङ्ग्राम में कोई (युनजन्) जोड़ता हुआ विजय को प्राप्त होता है, हे (मित्रावरुणौ) वायु और सूर्य्य के समान वर्त्तमान ! (अवोः) रक्षा करनेवाले (वाम्) तुम दोनों के (छर्दिषः) घर के (अभिष्टौ) सन्मुख यज्ञक्रिया में (यत्) जो प्रयत्न करता है तथा (युवोः) तुम दोनों के सम्बन्ध में (अस्कृधोयु) जो अपनी लघुता नहीं चाहता (इत्था) इस हेतु से (अनु) अनुकूलता से यत्न करता है, उसका सदैव सत्कार करो ॥११॥
Essence
हे अध्यापक और उपदेशको ! जो विद्यार्थी जन तुम्हारे काम को अपने काम के समान जानते हैं, वे ही दीर्घ आयुवाले, प्रशंसित विद्यायुक्त, धार्मिक परोपकारी होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशकों के गुणों का वर्णन होने से सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सड़सठवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर कौन विद्वान् होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥