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Rigveda Mandal 6 / Sukta 66 / Mantra 8

75 Sukta
11 Mantra
6/66/8
Devata- मरुतः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नास्य॑ व॒र्ता न त॑रु॒ता न्व॑स्ति॒ मरु॑तो॒ यमव॑थ॒ वाज॑सातौ। तो॒के वा॒ गोषु॒ तन॑ये॒ यम॒प्सु स व्र॒जं दर्ता॒ पार्ये॒ अध॒ द्योः ॥८॥

न । अस्य॑ । व॒र्ता । न । त॒रु॒ता । नु । अ॒स्ति॒ । मरु॑तः । यम् । अव॑थ । वाज॑ऽसातौ । तो॒के । वा॒ । गोषु॑ । तन॑ये । यम् । अ॒प्ऽसु । सः । व्र॒जम् । दर्ता॑ । पार्ये॑ । अध॑ । द्योः ॥

Mantra without Swara
नास्य वर्ता न तरुता न्वस्ति मरुतो यमवथ वाजसातौ। तोके वा गोषु तनये यमप्सु स व्रजं दर्ता पार्ये अध द्योः ॥

न। अस्य। वर्ता। न। तरुता। नु। अस्ति। मरुतः। यम्। अवथ। वाजऽसातौ। तोके। वा। गोषु। तनये। यम्। अप्ऽसु। सः। व्रजम्। दर्ता। पार्ये। अध। द्योः ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) विद्वानो ! तुम (वाजसातौ) अन्नादि पदार्थों के विभाग में (यम्) जिसको (गोषु) गौ आदि पशु वा पृथिवी विभागों वा (अप्सु) जलों वा (तोके) सन्तान (वा) वा (तनये) सुकुमार इन सब में (यम्) जिसकी (अवथ) रक्षा करते हो (अस्य) इस व्यवहार का कोई (वर्त्ता) वर्त्ताव करने और कोई (न) नहीं है और कोई (तरुता) उक्त व्यवहार का उल्लङ्घन करनेवाला (न) नहीं (अस्ति) है (सः) वह (अध) इसके अनन्तर (पार्य्ये) पार करने योग्य व्यवहार में (द्योः) प्रकाश के (व्रजम्) मेघ के समान शत्रुसेना को (दर्त्ता, नु) शीघ्र विदीर्ण करनेवाला है ॥८॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिनके विद्वान् जन रक्षा करनेवाले हों, उनको कहीं से भय नहीं प्राप्त होता, जैसे सूर्य से वर्षा होकर जगत् निर्भय होता है, वैसे ही धार्मिक विद्वानों के सङ्ग से समस्त राज्य निर्भय होता है ॥८॥
Subject
किन से रक्षा किये जाने पर भय नहीं है, इस विषय को कहते हैं ॥