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Rigveda Mandal 6 / Sukta 66 / Mantra 7

75 Sukta
11 Mantra
6/66/7
Devata- मरुतः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒ने॒नो वो॑ मरुतो॒ यामो॑ अस्त्वन॒श्वश्चि॒द्यमज॒त्यर॑थीः। अ॒न॒व॒सो अ॑नभी॒शू र॑ज॒स्तूर्वि रोद॑सी प॒थ्या॑ याति॒ साध॑न् ॥७॥

अ॒ने॒नः । वः॒ । म॒रु॒तः॒ । यामः॑ । अ॒स्तु॒ । अ॒न॒श्वः । चि॒त् । यम् । अज॑ति । अर॑थीः । अ॒न॒व॒सः । अ॒न॒भी॒शुः । र॒जः॒ऽतूः । वि । रोद॑सी॒ इति॑ । प॒थ्याः॑ । या॒ति॒ । साध॑न् ॥

Mantra without Swara
अनेनो वो मरुतो यामो अस्त्वनश्वश्चिद्यमजत्यरथीः। अनवसो अनभीशू रजस्तूर्वि रोदसी पथ्या याति साधन् ॥

अनेनः। वः। मरुतः। यामः। अस्तु। अनश्वः। चित्। यम्। अजति। अरथीः। अनवसः। अनभीशुः। रजःऽतूः। वि। रोदसी इति। पथ्याः। याति। साधन् ॥७॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुतः) मनुष्यो ! (वः) तुम्हारा चलन (अनेनः) निष्पाप (अस्तु) हो और (यामः) जिसमें जाते हैं उस प्रहर के समान जो (अनश्वः) ऐसा है कि जिसके घोड़े नहीं हैं (अरथीः) रथ नहीं हैं (अनवसः) अन्न जिसके नहीं है और (अनभीशुः) बलयुक्त बाहू नहीं है तथा जो (रजस्तूः) जल को बढ़ाता है वह (चित्) निश्चय के साथ (यम्) जिसको (अजति) प्रक्षिप्त करता फेंकता है वा (रोदसी) आकाश और पृथिवी के बीच निरन्तर (साधन्) साधता हुआ (पथ्याः) मार्गों में उत्तम गतियों को (वि, याति) विशेषता से जाता है, उसको तुम स्वीकार करो ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम पक्षपातरूपी पाप को छोड़ के निर्बलों की निरन्तर रक्षा कर भूगर्भविद्या और विद्युद्विद्या को अच्छे प्रकार सिद्ध कर भूमि और उदक तथा अन्तरिक्ष के मार्गों को उत्तम यानों से जाकर आओ ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥