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Rigveda Mandal 6 / Sukta 66 / Mantra 4

75 Sukta
11 Mantra
6/66/4
Devata- मरुतः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न य ईष॑न्ते ज॒नुषोऽया॒ न्व१॒॑न्तः सन्तो॑ऽव॒द्यानि॑ पुना॒नाः। निर्यद्दु॒ह्रे शुच॒योऽनु॒ जोष॒मनु॑ श्रि॒या तन्व॑मु॒क्षमा॑णाः ॥४॥

न । ये । ईष॑न्ते । ज॒नुषः॑ । अया॑ । नु । अ॒न्तरिति॑ । सन्तः॑ । अ॒व॒द्यानि॑ । पु॒ना॒नाः । निः । यत् । दु॒ह्रे । शुच॑यः । अनु॑ । जोष॑म् । अनु॑ । शृइ॒या । त॒न्व॑म् । उ॒क्षमा॑णाः ॥

Mantra without Swara
न य ईषन्ते जनुषोऽया न्व१न्तः सन्तोऽवद्यानि पुनानाः। निर्यद्दुह्रे शुचयोऽनु जोषमनु श्रिया तन्वमुक्षमाणाः ॥

न। ये। ईषन्ते। जनुषः। अया। नु। अन्तरिति। सन्तः। अवद्यानि। पुनानाः। निः। यत्। दुह्रे। शुचयः। अनु। जोषम्। अनु। श्रिया। तन्वम्। उक्षमाणाः ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (ये) जो (जनुषः) जन्मों को (न) नहीं (ईषन्ते) नष्ट करते किन्तु (अया) इस नीति से (अन्तः) बीच में (सन्तः) सत्पुरुष हुए (अवद्यानि) निन्द्यकर्मों को (नु) शीघ्र छोड़ के (पुनानाः) शरीर को पवित्र करते हुए होते हैं और (यत्) जो (शुचयः) पवित्र जन (अनु, जोषम्) सेवा के अनुकूल (श्रिया) लक्ष्मी से (तन्वम्) शरीर को (उक्षमाणाः) सेवन करते हुए (अनु, निर्, दुह्रे) अनुक्रम से जन्म पूरा करते हैं, वे धन्य होते हैं ॥४॥
Essence
जो मनुष्य ब्रह्मचर्यादि व्रतों को छोड़ मूढ़ होकर, शीघ्र विवाह कर, नपुंसक के अर्थात् हीजड़ा के समान होकर, निर्बल, रोगी, और लम्पट, मनुष्यों के बीच जिसकी कहावत हो रही हो तथा दुष्टव्यसन जिसको होता है, ऐसे पुरुष सौ वर्ष से पहिले ही शरीर को नष्ट-भ्रष्ट कर मनुष्य शरीर के फल को न पाकर दुर्भाग्यवश से निष्फल होते हैं ॥४॥
Subject
कौन श्रेष्ठ होते हैं, इस विषय को कहते हैं ॥