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Rigveda Mandal 6 / Sukta 66 / Mantra 11

75 Sukta
11 Mantra
6/66/11
Devata- मरुतः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं वृ॒धन्तं॒ मारु॑तं॒ भ्राज॑दृष्टिं रु॒द्रस्य॑ सू॒नुं ह॒वसा वि॑वासे। दि॒वः शर्धा॑य॒ शुच॑यो मनी॒षा गि॒रयो॒ नाप॑ उ॒ग्रा अ॑स्पृध्रन् ॥११॥

तम् । वृ॒धन्त॑म् । मारु॑तम् । भ्राज॑त्ऽऋष्टिम् । रु॒द्रस्य॑ । सू॒नुम् । ह॒वसा॑ । आ । वि॒वा॒से॒ । दि॒वः । शर्धा॑य । शुच॑यः । म॒नी॒षा । गि॒रयः॑ । न । आपः॑ । उ॒ग्राः । अ॒स्पृ॒ध्र॒न् ॥

Mantra without Swara
तं वृधन्तं मारुतं भ्राजदृष्टिं रुद्रस्य सूनुं हवसा विवासे। दिवः शर्धाय शुचयो मनीषा गिरयो नाप उग्रा अस्पृध्रन् ॥

तम्। वृधन्तम्। मारुतम्। भ्राजत्ऽऋष्टिम्। रुद्रस्य। सूनुम्। हवसा। आ। विवासे। दिवः। शर्धाय। शुचयः। मनीषा। गिरयः। न। आपः। उग्राः। अस्पृध्रन् ॥११॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 6

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Meaning
जो (शुचयः) पवित्र (मनीषाः) मनस्वी अर्थात् उत्साही मनवाले (उग्राः) तेजस्वी (गिरयः) मेघ और (आपः) जलों के (न) समान (दिवः) मनोहर पदार्थ के (शर्धाय) बल के लिये (अस्पृध्रन्) स्पर्द्धा करें उनके साथ (वृधन्तम्) आप बढ़ते वा दूसरों को बढ़ाते हुए (मारुतम्) पवनों की विद्या जाननेवाले (भ्राजदृष्टिम्) प्रकाशमान दृष्टियुक्त (रुद्रस्य) किया है चवालीस वर्ष पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य जिसने उसके (तम्) उस (सुनूम्) पुत्र को (हवसा) लेने के व्यवहार से मैं (आ, विवासे) सेवता हूँ ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य मेघ के समान उन्नति करने, प्रजा के पालने, जल के समान पुष्टि करनेवाले, पवित्र आशययुक्त, तेजस्वी और मनोहर बल के बढ़ानेवाले हों, उनके साथ यदि राजा राज्यशिक्षा करे तो कहीं पराजय और अपकीर्ति न हो ॥११॥ इस सूक्त में पवनों के गुणों के समान विद्वानों और वीरों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छियासठवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर मनुष्यों को किनके साथ कैसा जन राज्य का अधिकारी करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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