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Rigveda Mandal 6 / Sukta 64 / Mantra 5

75 Sukta
6 Mantra
6/64/5
Devata- उषाः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सा व॑ह॒ योक्षभि॒रवा॒तोषो॒ वरं॒ वह॑सि॒ जोष॒मनु॑। त्वं दि॑वो दुहित॒र्या ह॑ दे॒वी पू॒र्वहू॑तौ मं॒हना॑ दर्श॒ता भूः॑ ॥५॥

सा । आ । व॒ह॒ । या । उ॒क्षऽभिः॑ । अवा॑ता । उषः॑ । वर॑म् । वह॑सि । जोष॑म् । अनु॑ । त्वम् । दि॒वः॒ । दु॒हि॒तः॒ । या । ह॒ । दे॒वी । पू॒र्वऽहू॑तौ । मं॒हना॑ । द॒र्श॒ता । भूः॒ ॥

Mantra without Swara
सा वह योक्षभिरवातोषो वरं वहसि जोषमनु। त्वं दिवो दुहितर्या ह देवी पूर्वहूतौ मंहना दर्शता भूः ॥

सा। आ। वह। या। उक्षऽभिः। अवाता। उषः। वरम्। वहसि। जोषम्। अनु। त्वम्। दिवः। दुहितः। या। ह। देवी। पूर्वऽहूतौ। मंहना। दर्शता। भूः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (दिवः) सूर्य की (दुहितः) कन्या के तुल्य तथा (उषः) उषा प्रभातवेला के समान वर्त्तमान श्रेष्ठ मुखवाली ! (या) जो (अवाता) वायुरहित (उक्षभिः) वीर्यसेचकों से युक्त (वरम्) श्रेष्ठ (जोषम्) प्रीति से चाहे हुए पति को (अनु) अनुकूलता से (त्वम्) तू (वहसि) प्राप्त होती (सा) वह मुझ पति को (आ, वह) सब ओर से प्राप्त हो (या) जो (ह) ही (पूर्वहूतौ) पूर्व सत्कार करने योग्यों के आह्वान के निमित्त (मंहना) सत्कार करने और (दर्शता) देखने योग्य (देवी) विदुषी तू (भूः) हो सो मेरी प्रिया स्त्री हो ॥५॥
Essence
जैसे उषा रात्रि के अनुकूल वर्त्तमान नियम से अपने काम को करती है, वैसे ही नियमयुक्त स्त्री अपने घर के कामों को करे तथा ब्रह्मचर्य के अनन्तर अपने मन के प्यारे पति को विवाह कर प्रसन्न होती हुई पति को निरन्तर प्रसन्न करे, ऐसे ही पति भी उस अनुकूल आचरण करनेवाली को सदैव आनन्दित करे ॥५॥
Subject
फिर वे स्त्री-पुरुष कैसे वर्त्ताव वर्त्तें, इस विषय को कहते हैं ॥