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Rigveda Mandal 6 / Sukta 64 / Mantra 4

75 Sukta
6 Mantra
6/64/4
Devata- उषाः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒गोत ते॑ सु॒पथा॒ पर्व॑तेष्ववा॒ते अ॒पस्त॑रसि स्वभानो। सा न॒ आ व॑ह पृथुयामन्नृष्वे र॒यिं दि॑वो दुहितरिष॒यध्यै॑ ॥४॥

सु॒ऽगा । उ॒त । ते॒ । सु॒ऽपथा॑ । पर्व॑तेषु । अ॒वा॒ते । अ॒पः । त॒र॒सि॒ । स्व॒भा॒नो॒ इति॑ स्वऽभानो । सा । नः॒ । आ । व॒ह॒ । पृ॒थु॒ऽया॒म॒न् । ऋ॒ष्वे॒ । र॒यिम् । दि॒वः॒ । दु॒हि॒तः॒ । इ॒ष॒यध्यै॑ ॥

Mantra without Swara
सुगोत ते सुपथा पर्वतेष्ववाते अपस्तरसि स्वभानो। सा न आ वह पृथुयामन्नृष्वे रयिं दिवो दुहितरिषयध्यै ॥

सुऽगा। उत। ते। सुऽपथा। पर्वतेषु। अवाते। अपः। तरसि। स्वभानो इति स्वऽभानो। सा। नः। आ। वह। पृथुऽयामन्। ऋष्वे। रयिम्। दिवः। दुहितः। इषयध्यै ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वभानो) अपनी दीप्तियुक्त (पृथुयामन्) बहुत पदार्थों की प्राप्ति करानेवाले (ऋष्वे) महान् गुणयुक्त विद्वन् ! आप इस स्त्री के साथ (रयिम्) लक्ष्मी को (आ, वह) प्राप्त कराइये और (नः) हम लोगों की रक्षा करिये तथा (अपः) जलों के समान दुःखों को (तरसि) तरते अर्थात् उनसे अलग होते हो और (अवाते) निर्वात होने से (पर्वतेषु) पर्वतों में जैसे सुपथ से जाते हो तथा जो (ते) तुम्हारी (सुगा) सुन्दरता से जाने योग्य स्त्री वा हे (दिवः) प्रकाश की (दुहितः) कन्या के समान वर्त्तमान स्त्री ! तू पति को (इषयध्यै) प्राप्त होने योग्य हो (उत) और तेरा पति तेरे मन का प्रिय हो (सा) तू हम लोगों को (सुपथा) अच्छे मार्ग से सुख प्राप्त करा ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अच्छी नीतिवाले राजजन पर्वतों में भी अच्छे मार्गों को बनाकर सब मार्ग चलनेवालों को सुखी करते हैं वा जैसे उषा (प्रभातवेला) मार्गों को प्रकाशित करती है, वैसे ही उत्तम परस्पर प्रसन्न स्त्री पुरुष धर्ममार्ग का संशोधन कर परोपकार का प्रकाश कराते हैं ॥४॥
Subject
फिर वह स्त्री कैसी हो, इस विषय को कहते हैं ॥