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Rigveda Mandal 6 / Sukta 64 / Mantra 3

75 Sukta
6 Mantra
6/64/3
Devata- उषाः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वह॑न्ति सीमरु॒णासो॒ रुश॑न्तो॒ गावः॑ सु॒भगा॑मुर्वि॒या प्र॑था॒नाम्। अपे॑जते॒ शूरो॒ अस्ते॑व॒ शत्रू॒न्बाध॑ते॒ तमो॑ अजि॒रो न वोळ्हा॑ ॥३॥

वह॑न्ति । सी॒म् । अ॒रु॒णासः॑ । रुश॑न्तः । गावः॑ । सु॒ऽभगा॑म् । उ॒र्वि॒या । प्र॒थ॒नाम् । अप॑ । ई॒ज॒ते॒ । शूरः॑ । अस्ता॑ऽइव । शत्रू॑न् । बाध॑ते । तमः॑ । अ॒जि॒रः । न । वोळ्हा॑ ॥

Mantra without Swara
वहन्ति सीमरुणासो रुशन्तो गावः सुभगामुर्विया प्रथानाम्। अपेजते शूरो अस्तेव शत्रून्बाधते तमो अजिरो न वोळ्हा ॥

वहन्ति। सीम्। अरुणासः। रुशन्तः। गावः। सुऽभगाम्। उर्विया। प्रथानाम्। अप। ईजते। शूरः। अस्ताऽइव। शत्रून्। बाधते। तमः। अजिरः। न। वोळ्हा ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 3

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Meaning
हे स्त्री ! तू (अजिरः) जो शीघ्र नहीं जाता उस पुरुष के (न) समान और (वोळ्हा) विवाहित स्त्री (शत्रून्) शत्रुओं को (शूरः) बल वा पराक्रम आदि योग से निर्भय (अस्तेव) शस्त्र और अस्त्रों को अच्छे प्रकार फेंकनेवाले के समान (अप, ईजते) दूर करती तथा प्रभातवेला जैसे (तमः) अन्धकार वा रात्रि को (बाधते) नष्ट-भ्रष्ट करे वा जैसे (अरुणासः) लाल काली पीली धौली आदि (रुशन्तः) पदार्थों को छिन्न-भिन्न करती हुई (गावः) किरणें सब पदार्थों को (सीम्) सब ओर से (वहन्ति) पहुँचाती हैं, वैसे (उर्विया) बहुत पुरुषार्थयुक्त हो। हे पुरुष ! उषा को जैसे सूर्य, वैसे इस (प्रथानाम्) अत्यन्त सुन्दरता से प्रख्यात भार्या को (सुभगाम्) सौभाग्य करो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे मनुष्यो ! जो प्रभातवेला के समान सुप्रकाश, सुरूपवती, सूर्य किरणों के तुल्य घर के कामों की व्यवस्था का निर्वाह करनेवाली, शूरवीर के समान व्यथा अर्थात् परिश्रम की थकावट न माननेवाली स्त्रियाँ हों, उनका निरन्तर सत्कार कर सौभाग्युक्त करो ॥३॥
Subject
फिर वे कैसी हों, इस विषय को कहते हैं ॥

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