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Rigveda Mandal 6 / Sukta 63 / Mantra 10

75 Sukta
11 Mantra
6/63/10
Devata- अश्विनौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सं वां॑ श॒ता ना॑सत्या स॒हस्राश्वा॑नां पुरु॒पन्था॑ गि॒रे दा॑त्। भ॒रद्वा॑जाय वीर॒ नू गि॒रे दा॑द्ध॒ता रक्षां॑सि पुरुदंससा स्युः ॥१०॥

सम् । वा॒म् । श॒ता । ना॒स॒त्या॒ । स॒हस्रा॑ । अश्वा॑नाम् । पु॒रु॒ऽपन्थाः॑ । गि॒रे । दा॒त् । भ॒रत्ऽवा॑जाय । वी॒र॒ । नु । गि॒रे । दा॒त् । ह॒ता । रक्षां॑सि । पु॒रु॒ऽदं॒स॒सा॒ । स्यु॒रिति॑ स्युः ॥

Mantra without Swara
सं वां शता नासत्या सहस्राश्वानां पुरुपन्था गिरे दात्। भरद्वाजाय वीर नू गिरे दाद्धता रक्षांसि पुरुदंससा स्युः ॥

सम्। वाम्। शता। नासत्या। सहस्रा। अश्वानाम्। पुरुऽपन्थाः। गिरे। दात्। भरत्ऽवाजाय। वीर। नु। गिरे। दात्। हता। रक्षांसि। पुरुऽदंससा। स्युरिति स्युः ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 4 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुदंससा) बहुत उत्तम कर्म्मोंवाले (नासत्या) अधर्माचरण रहित जो (वाम्) तुम दोनों का (पुरुपन्थाः) बहुत प्रकार का मार्ग (अश्वानाम्) घोड़े वा अग्नि आदि पदार्थों की (गिरे) वाणी के लिये (शता) सैकड़ों वा (सहस्रा) हजारों प्रकारों को (सम्, दात्) अच्छे प्रकार देता है जो (भरद्वाजाय) धारण किया विज्ञान जिसने उसके लिये वा (गिरे) राजनीतियुक्त वाणी के लिये सैकड़ों और हजारों प्रकारों को (दात्) देता है जिससे (रक्षांसि) राक्षस (हता) नष्ट (स्युः) हों, हे (वीर) वीर ! उससे आप दुष्टों को (नू) शीघ्र मारो ॥१०॥
Essence
हे राजा और सेनापतियो ! जो धार्मिक न्याय से राज्य की पालना करने और शत्रुओं से अपनी सेना की रक्षा करने के लिये यत्न करे, उसके लिये असङ्ख्य धन और प्रतिष्ठा निरन्तर करो ॥१०॥
Subject
फिर राजा और सेनापति क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥