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Rigveda Mandal 6 / Sukta 62 / Mantra 5

75 Sukta
11 Mantra
6/62/5
Devata- अश्विनौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ता व॒ल्गू द॒स्रा पु॑रु॒शाक॑तमा प्र॒त्ना नव्य॑सा॒ वच॒सा वि॑वासे। या शंस॑ते स्तुव॒ते शंभ॑विष्ठा बभू॒वतु॑र्गृण॒ते चि॒त्ररा॑ती ॥५॥

ता । व॒ल्गू । द॒स्रा । पु॒रु॒शाक॑ऽतमा । प्र॒त्ना । नव्य॑सा । वच॑सा । आ । वि॒वा॒से॒ । या । शंस॑ते । स्तु॒व॒ते । शम्ऽभ॑विष्ठा । ब॒भू॒वतुः॑ । गृ॒ण॒ते । चि॒त्ररा॑ती॒ इति॑ चि॒त्रऽरा॑ती ॥

Mantra without Swara
ता वल्गू दस्रा पुरुशाकतमा प्रत्ना नव्यसा वचसा विवासे। या शंसते स्तुवते शंभविष्ठा बभूवतुर्गृणते चित्रराती ॥

ता। वल्गू। दस्रा। पुरुशाकऽतमा। प्रत्ना। नव्यसा। वचसा। आ। विवासे। या। शंसते। स्तुवते। शम्ऽभविष्ठा। बभूवतुः। गृणते। चित्रराती इति चित्रऽराती ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (या) जो (वल्गू) अत्युत्तम (दस्रा) दुःख को नष्ट करनेवाले (प्रत्ना) प्राचीन (नव्यसा) अत्यन्त नवीन (वचसा) परिभाषण करने योग्य (पुरुशाकतमा) अतीव सामर्थ्यवाले (चित्रराती) जिनसे अद्भुत दान होता वे (शंसते) प्रशंसा करनेवाले (स्तुवते) वा प्रशंसा पाये हुए वा (गृणते) सत्य उपदेश करनेवाले के लिये (शम्भविष्ठा) अतीव सुख की भावना करानेवाले (बभूवतुः) होते हैं (ता) उनकी (आ, विवासे) सेवा करता हूँ, वैसे उनकी तुम भी सेवा करो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो वायु और बिजुली कारणरूप से सनातन और कार्यरूप से नूतन, बहुत शक्तिमान्, वेगादि गुणयुक्त, कल्याणकारी वर्त्तमान हैं, उनको यथावत् जानो ॥५॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय को कहते हैं ॥