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Rigveda Mandal 6 / Sukta 62 / Mantra 11

75 Sukta
11 Mantra
6/62/11
Devata- अश्विनौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ प॑र॒माभि॑रु॒त म॑ध्य॒माभि॑र्नि॒युद्भि॑र्यातमव॒माभि॑र॒र्वाक्। दृ॒ळ्हस्य॑ चि॒द्गोम॑तो॒ वि व्र॒जस्य॒ दुरो॑ वर्तं गृण॒ते चि॑त्रराती ॥११॥

आ । प॒र॒माभिः॑ । उ॒त । म॒ध्य॒माभिः॑ । नि॒युत्ऽभिः॑ । या॒त॒म् । अ॒व॒माभिः॑ । अ॒र्वाक् । दृ॒ळ्हस्य॑ । चि॒त् । गोऽम॑तः । वि । व्र॒जस्य॑ । दुरः॑ । व॒र्त॒म् । गृ॒ण॒ते । चि॒त्र॒रा॒ती॒ इति॑ चित्रऽराती ॥

Mantra without Swara
आ परमाभिरुत मध्यमाभिर्नियुद्भिर्यातमवमाभिरर्वाक्। दृळ्हस्य चिद्गोमतो वि व्रजस्य दुरो वर्तं गृणते चित्रराती ॥

आ। परमाभिः। उत। मध्यमाभिः। नियुत्ऽभिः। यातम्। अवमाभिः। अर्वाक्। दृळ्हस्य। चित्। गोऽमतः। वि। व्रजस्य। दुरः। वर्तम्। गृणते। चित्रराती इति चित्रऽराती ॥११॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 6

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Meaning
हे (चित्रराती) अद्भुत दानवाले सभासेनाधीशो ! तुम (अवमाभिः) निकृष्ट (मध्यमाभिः) मध्यम (उत) और (परमाभिः) उत्तम (नियुद्भिः) वायु की गतियों से (आ, यातम्) आओ तथा (अर्वाक्) पीछे (दृळ्हस्य) अति पुष्ट के (चित्) भी (गोमतः) बहुत गौयें वा किरणें जिसमें विद्यमान उस (वज्रस्य) मेघ के (दुरः) द्वारों को (गृणते) स्तुति करनेवाले के लिये (वि, वर्त्तम्) विशेषता से वर्त्ताओ ॥११॥
Essence
हे राज प्रजाजनो ! जैसे सब भूगोल वायु की गतियों के साथ जाते-आते हैं और जैसे शिल्पीजन विमान से मेघमण्डल पर जाते हैं, वैसे ही तुम भी अनुष्ठान करो ॥११॥ इस सूक्त में अश्वियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह बासठवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वे क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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