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Rigveda Mandal 6 / Sukta 62 / Mantra 10

75 Sukta
11 Mantra
6/62/10
Devata- अश्विनौ Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अन्त॑रैश्च॒क्रैस्तन॑याय व॒र्तिर्द्यु॒मता या॑तं नृ॒वता॒ रथे॑न। सनु॑त्येन॒ त्यज॑सा॒ मर्त्य॑स्य वनुष्य॒तामपि॑ शी॒र्षा व॑वृक्तम् ॥१०॥

अन्त॑रैः । च॒क्रैः । तन॑याय । व॒र्तिः । द्यु॒ऽमता॑ । आ । या॒त॒म् । नृ॒ऽवता॑ । रथे॑न । सनु॑त्येन । त्यज॑सा । मर्त्य॑स्य । व॒नु॒ष्य॒ताम् । अपि॑ । शी॒र्षा । व॒वृ॒क्त॒म् ॥

Mantra without Swara
अन्तरैश्चक्रैस्तनयाय वर्तिर्द्युमता यातं नृवता रथेन। सनुत्येन त्यजसा मर्त्यस्य वनुष्यतामपि शीर्षा ववृक्तम् ॥

अन्तरैः। चक्रैः। तनयाय। वर्तिः। द्युऽमता। आ। यातम्। नृऽवता। रथेन। सनुत्येन। त्यजसा। मर्त्यस्य। वनुष्यताम्। अपि। शीर्षा। ववृक्तम् ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो राजा लोग (अन्तरैः) भिन्न-भिन्न (चक्रैः) लोकों के घूमने के लिये परिधियों के वर्त्तमान (द्युमता) प्रकाशवान् (नृवता) जिसमें उत्तम नर विद्यमान उस (रथेन) रमणीय विमानादि यान वा (सनुत्येन) प्रेरणा करने योग्य के साथ वर्त्तमान (त्यजसा) त्याग के साथ (मर्त्यस्य) मनुष्य के (तनयाय) पुत्र के लिये (वर्त्तिः) मार्ग को (आ, यातम्) प्राप्त होवें और मार्ग का विधान कर (वनुष्यताम्) क्रोध करने वा बाधावालों के (शीर्षा) शिरों को (अपि) भी (ववृक्तम्) छिन्न-भिन्न करें, उनका सबको सत्कार करना चाहिये ॥१०॥
Essence
यदि सभासेनापति, मनुष्य-सन्तानों का ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास आदि का प्रबन्ध करें तो सब विद्वान् होकर अनेक उत्तम कार्य करने और दुष्टों तथा शत्रुओं के निवारने को समर्थ हों ॥१०॥
Subject
फिर सभा सेनापति जगत् के उपकार के लिये क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥