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Rigveda Mandal 6 / Sukta 61 / Mantra 5

75 Sukta
14 Mantra
6/61/5
Devata- सरस्वती Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यस्त्वा॑ देवि सरस्वत्युपब्रू॒ते धने॑ हि॒ते। इन्द्रं॒ न वृ॑त्र॒तूर्ये॑ ॥५॥

यः । त्वा॒ । दे॒वि॒ । स॒र॒स्व॒ति॒ । उ॒प॒ऽब्रू॒ते । धने॑ । हि॒ते । इन्द्र॑म् । न । वृ॒त्र॒ऽतूर्ये॑ ॥

Mantra without Swara
यस्त्वा देवि सरस्वत्युपब्रूते धने हिते। इन्द्रं न वृत्रतूर्ये ॥

यः। त्वा। देवि। सरस्वति। उपऽब्रूते। धने। हिते। इन्द्रम्। न। वृत्रऽतूर्ये ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 30 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे (देवि) विदुषी (सरस्वति) विज्ञानयुक्ता भार्या ! (यः) जो (त्वा) तुझे (वृत्रतूर्ये) मेघ के हिंसन में (इन्द्रम्) बिजुली के (न) समान (हिते) सुख करनेवाले (धने) द्रव्य के निमित्त (उपब्रूते) कहता है, उस विद्वान् पति की तू सेवा कर ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे पुरुषो ! जैसे पतिव्रता विदुषी स्त्रियाँ तुम लोगों को सत्य ग्रहण कराकर प्रिय वचन कहती हैं, वैसे इनके साथ तुम भी हित करो ॥५॥
Subject
फिर वह किसके तुल्य क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥

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