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Rigveda Mandal 6 / Sukta 61 / Mantra 11

75 Sukta
14 Mantra
6/61/11
Devata- सरस्वती Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ॒प॒प्रुषी॒ पार्थि॑वान्यु॒रु रजो॑ अ॒न्तरि॑क्षम्। सर॑स्वती नि॒दस्पा॑तु ॥११॥

आ॒ऽप॒प्रुषी॑ । पार्थि॑वानि । उ॒रु । रजः॑ । अ॒न्तरि॑क्षम् । सर॑स्वती । नि॒दः । पा॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
आपप्रुषी पार्थिवान्युरु रजो अन्तरिक्षम्। सरस्वती निदस्पातु ॥

आऽपप्रुषी। पार्थिवानि। उरु। रजः। अन्तरिक्षम्। सरस्वती। निदः। पातु ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 32 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (पार्थिवानि) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध हुए वा विदित हुए (उरु) बहुत (रजः) परमाणु आदि पदार्थों को तथा (अन्तरिक्षम्) आकाश को (आपप्रुषी) सब ओर से व्याप्त (सरस्वती) विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त वाणी हम लोगों को (निदः) निन्दकों से (पातु) बचावे ॥११॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो वाणी सर्वत्र आकाश में व्याप्त है, उसको जान के इससे किसी की भी निन्दा अर्थात् गुणों में दोषारोपण और दोषों में गुणारोपण कभी न करो ॥११॥
Subject
फिर वह कैसी और क्या करती है, इस विषय को कहते हैं ॥

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