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Rigveda Mandal 6 / Sukta 60 / Mantra 4

75 Sukta
15 Mantra
6/60/4
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ता हु॑वे॒ ययो॑रि॒दं प॒प्ने विश्वं॑ पु॒रा कृ॒तम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी न म॑र्धतः ॥४॥

ता । हु॒वे॒ । ययोः॑ । इ॒दम् । प॒प्ने । विश्व॑म् । पु॒रा । कृ॒तम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । न । म॒र्ध॒तः॒ ॥

Mantra without Swara
ता हुवे ययोरिदं पप्ने विश्वं पुरा कृतम्। इन्द्राग्नी न मर्धतः ॥

ता। हुवे। ययोः। इदम्। पप्ने। विश्वम्। पुरा। कृतम्। इन्द्राग्नी इति। न। मर्धतः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 27 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(ययोः) जिनका (इदम्) यह (विश्वम्) समस्त जगत् वा (पप्ने) जिन से प्रवृत्त हुए व्यवहार में (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली (पुरा) पहिले (कृतम्) किये हुए इस विश्व को (न) नहीं (मर्धतः) नष्ट करते हैं (ता) उनको मैं (हुवे) ग्रहण करता हूँ ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिन वायु और बिजुली से सब जगत् व्यवहार करता है तथा जो संसार में स्थिर हो किसी को नष्ट नहीं करते हैं और विकार को प्राप्त हुए वे नष्ट करते हैं, मनुष्यों को चाहिये कि उनको जान कर यथावत् उपकार करें ॥४॥
Subject
मनुष्यों को चाहिये कि वायु और बिजुली को यथावत् जानें, इस विषय को कहते हैं ॥