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Rigveda Mandal 6 / Sukta 60 / Mantra 15

75 Sukta
15 Mantra
6/60/15
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑ग्नी शृणु॒तं हवं॒ यज॑मानस्य सुन्व॒तः। वी॒तं ह॒व्यान्या ग॑तं॒ पिब॑तं सो॒म्यं मधु॑ ॥१५॥

इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑ । शृ॒णु॒तम् । हव॑म् । यज॑मानस्य । सु॒न्व॒तः । वी॒तम् । ह॒व्यानि॑ । आ । ग॒त॒म् । पिब॑तम् । सो॒म्यम् । मधु॑ ॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी शृणुतं हवं यजमानस्य सुन्वतः। वीतं हव्यान्या गतं पिबतं सोम्यं मधु ॥

इन्द्राग्नी इति। शृणुतम्। हवम्। यजमानस्य। सुन्वतः। वीतम्। हव्यानि। आ। गतम्। पिबतम्। सोम्यम्। मधु ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 29 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान वर्त्तमान अध्यापक और उपदेशको ! तुम दोनों (सुन्वतः) पदार्थविद्या से बहुत पदार्थों को उत्पन्न करते हुए (यजमानस्य) शुभ गुण देनेवाले मेरे (हवम्) पढ़े विषय को (शृणुतम्) सुनो और (हव्यानि) पदार्थों को (वीतम्) प्राप्त होओ वा व्याप्त होओ उनके समीप (आ, गतम्) आओ और (सोम्यम्) शान्ति शीतलता के जो योग्य है उस (मधु) मधुरादि युक्त रसको (पिबतम्) पिओ ॥१५॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिये कि आमन्त्रण से विद्वानों को बुलाकर इनका सत्कार कर इनसे अपनी विद्या की परीक्षा कराय अधिक विद्या ग्रहण करें ॥१५॥ इस सूक्त में इन्द्र और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह साठवाँ सूक्त और उनतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वे दोनों क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥